प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह इन दिनों अमेरिका की बिजनेस लाबी के निशाने पर है. भारत विशाल जनसंख्या का विशाल भू-भाग है. पूर्व प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हा राव के जमाने से भारत ने राष्ट्रीयकरण और स्टेट केपीटलिज्म को त्याग कर आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण (फ्री एन्टरप्राइज) की नीति अपना ली है. सरकारी उपक्रमों का विनिवेश किया जा रहा है. पंडित नेहरू के जमाने से नीति के तौर पर समाजवाद के नाम पर लगभग सभी निजी उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की नीति अपनाई गई. निजी हवाई कंपनियों टाटा और भारत एयरवेज को मिलाकर एयर इंडिया व इंडियन एयरलाइन बना दिया, कोयला खदानें, बीमा बैंक के साथ राज्यों में निजी बसों का भी राष्ट्रीयकरण कर डाला.

तमाम भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद श्री नरसिम्हाराव को यह श्रेय दिया जायेगा कि उन्होंने हिम्मत दिखा राष्टï्र की अर्थव्यवस्था को चौपट करती जा रही राष्ट्रीयकरण की नीति को त्याग दिया. आज निजी हवाई कम्पनियां, निजी बसें, निजी उद्योगों का दौर फिर से प्रारंभ हो गया है. इस परिवर्तन के जनक वास्तव में श्री मनमोहन सिंह हैं, जिन्हें श्री नरसिम्हा राव ने शासकीय सेवा से मुक्त कर अपनी सरकार में वित्त मंत्री बनाया. भारत को 'सेल्स टैक्स' का विचार चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने दिया था और 'सर्विस टैक्सÓ प्रणाली श्री मनमोहन सिंह का विचार है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि श्री मनमोहन सिंह अर्थव्यवस्था के दिग्गज हैं. लेकिन यह यथार्थ भी सबके सामने है कि वे वित्त मंत्री बनकर राजनीति में आने से पहले यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और बाद में सरकार में आर्थिक क्षेत्र के बड़े अफसर रहे हैं. वे रिजïर्व बैंक के गवर्नर भी थे.  राजनीति में उन्होंने साहस भी दिखाया है. वे सिविल परमाणु ऊर्जा के प्रणेता और प्रबल पक्षधर रहे. उन्होंने इस क्षेत्र में विकसित देशों से समझौते भी किये. अमेरिका, फ्रान्स, ब्रिटेन, रूस, कनाडा से करार भी हुये. लेकिन अमेरिका से करार में वामपंथी दल विरोध कर रहे थे, जो उन दिनों यू.पी.ए. प्रथम सरकार के बड़े सहयोगी थे. लेकिन प्रधानमंत्री श्री सिंह व कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने राजनैतिक व्यूह रचना कर सिविल परमाणु ऊर्जा विधेयक पास करा लिया. वामपंथियों ने समर्थन वापस ले लिया, लेकिन सरकार को गिरा नहीं पाये. उस समय अमेरिका के अखबारों ने प्रधानमंत्री श्री सिंह की प्रशंसा में बड़े कसीदे लिखे थे. वहां की सरकार ने भी प्रधानमंत्री को दृढ़ राजनेता और दूरदर्शी कहते हुए उन्हें एशियाई अर्थ-व्यवस्था का नायक कहा.

इन दिनों अमेरिका की बिजनेस लाबी जल्दी से जल्दी यह चाहती है कि भारत की मनमोहन सिंह सरकार रिटेल बाजार व व्यवसाय में उन्हें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ.डी.आई) की अनुमति दे दे. प्रधानमंत्री स्वयं और पूरी यू.पी.ए. सरकार भी यही चाहती है कि एफ.डी.आई. देश के आर्थिक हित में है और फौरन होना चाहिए. लेकिन इस बार विरोध पक्ष तो विरोध कर ही रहा है- जो सामान्य बात है, उससे यह रूकेगा नहीं. लेकिन रुकावट यह है कि कई भाजपा, समाजवादी पार्टी, जनता दल यूनाईटेड व ममता की तृणमूल पार्टी की राज्य सरकारों ने यह कह दिया है कि वे अपने राज्य में विदेशी रिटेल स्वीकार नहीं करेंगे. इसमें मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान हैं. इस वजह से जो देरी हो रही है उससे ही एफ.डी.आई. के लिए उतावली हो रही अमेरिका की बिजनेस लाबी और अखबार प्रधानमंत्री श्री सिंह को अक्षम, कठपुतली, नौकरशाह, नान अचीवर आदि राजनैतिक अपशब्दों से अपनी झल्लाहट निकाल रहे हैं. लेकिन हमको हमारी दृष्टिï व परिस्थितियों में फैसला करना है. अमेरिका का उतावलापन उनकी समस्या है, वह हमारी मजबूरी या जरूरत नहीं है. संसार के सबसे बड़े प्रजातंत्र में श्री मनमोहन सिंह दूसरी पारी खेलने वाले प्रधानमंत्री हैं- यही प्रमाण पत्र सभी अमेरिकी झल्लाहट का जवाब है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी

प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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