मध्यप्रदेश में सोयाबीन, गेहूं, चना की बम्पर फसलों के साथ ही राज्य में दालों की खेती के लिये भी रकबे में काफी वृद्धि की गई है. कुछ दशकों तक किसान सोयाबीन के केश क्राप होने की वजह से उस तरफ ज्यादा झुक गये और इसका नतीजा यह हुआ कि जिन खेतों पर दालों की खेती होनी थी वह सोयाबीन की खेती में परिवर्तित हो गये. लगभग ऐसा ही वातावरण देश के अन्य भागों में बन गया, जिससे भारत में दालों की खेती इतनी कम हो गई कि हमारी जरूरत भी पूरी नहीं हो पायी. इस समय भी भारत दुनिया का सबसे बड़ा दलहन उत्पादक देश है.

भारत की दालों की जरूरत लगभग 200 लाख टन है, लेकिन हमारे खुद के उत्पादन से यह जरूरत पूरी न हो सकने की वजह से हमें लगभग 40 लाख टन दालों का आयात करना पड़ता है. इस समय खाद्य तेल में भी हमारा उत्पादन जरूरत से बहुत कम है और हमें लगभग 70 लाख टन खाद्य तेल भी आयात करना पड़ता है. लेकिन दालों के मामले में भारत के किसानों को धन्यवाद देना होगा कि उन्होंने स्थिति को इतनी शीघ्रता से सम्हाल दिया कि अब हमारी जरूरत हमारे उत्पादन से ही पूरी हो जाएगी और देश में दालों का सरप्लस भी हो जायेगा. इससे दालों का बफर स्टाक आसानी से बन जायेगा. पिछले साल 2010-11 में हमारा दालों का उत्पादन लगभग 19 लाख टन था, जो इस साल 2011-12 में रिकार्ड ऊंचाई पर पहुंचकर लगभग 230 लाख टन हो जायेगा. उत्पादन में 200 लाख टन की वृद्धि एक चमत्कार ही है.

मौसम के उतार-चढ़ाव में खरीफ सीजन में दलहन की लगभग 7 लाख हेक्टेयर रकबे में फसल खराब हो गई है. मध्यप्रदेश में हर बार की तरह इस साल भी बोवनी अच्छी हुई है और फसल भी अच्छी आ रही है. इस बार राज्य में ठंड काफी देर से आ रही है इसलिए दालों की फसल थोड़ी प्रभावित हो सकती है. जिस तरह गेहूं में मालवा के शरबती गेहूं का भारत में उच्च कोटि का स्थान है, उसी तरह तुअर दाल में भिन्ड व मुरैना का नाम भी बहुत ऊंचा है. दाल हमारी भोजन का अनिवार्य अंग है और प्रोटीन का मुख्य स्रोत है. केन्द्र ने दालों को उत्साहित करने के लिए 800 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया है.

 

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