नई दिल्ली, 23 अक्टूबर. भारत सहित विभिन्न देशों द्वारा संयुक्त राष्ट्र में सुधार की बढ़ती मागों के बीच सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता को लेकर खींचतान जारी है। भारत, ब्राजील, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका जैसे कई देश चाहते हैं कि सुरक्षा परिषद का विस्तार किया जाए ताकि यह विश्व की मौजूदा आर्थिक एवं सामरिक सच्चाई का सही प्रतिनिधित्व कर सके।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि कई देशों की प्रबल दावेदारी, अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव और पश्चिमी देशों में आर्थिक मंदी के बादल फिर से मंडराने के चलते इस शक्तिशाली निकाय में भारत के स्थायी सदस्य बनने का सपना सच होने में अभी लंबा वक्त लग सकता है। कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि लीग आफ नेशन की विफलता के बाद द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर स्थापित संयुक्त राष्ट्र ने पिछले कुछ वर्षों में विश्व की कई प्रमुख समस्याओं का समाधान निकालने में अपनी प्रभाव क्षमता को काफी हद तक गंवा दिया है। इसका शक्तिशाली निकाय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद भी पाच राष्ट्रों की सामरिक कूटनीति का शिकार बन गया है। ऐसे में भारत जैसे कई राष्ट्र इसकी स्थायी सदस्यता के विस्तार की माग कर रहे हैं।

पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्यता हासिल करने में अभी बहुत समय लगेगा। स्थायी सदस्यता अगर मिल भी गई तो यह अकेले भारत को नहीं मिलेगी बल्कि पैकेज के साथ मिलेगी जिसमें जापान, भारत, जर्मनी और ब्राजील शामिल होंगे। नटवर सिंह ने कहा कि भारत को स्थायी सदस्यता इतनी आसानी से नहीं मिलेगी। इसमें कई पेंच हैं। इतने सारे देशों को एक साथ अपने पक्ष में लाना आसान नहीं होगा। भारत को कड़ी मेहनत करनी होगी। उल्लेखनीय है कि भारत इस समय सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य है।

उन्होंने कहा, इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में संशोधन करना होगा जो आसान नहीं है। सुरक्षा परिषद में पाच स्थायी सदस्य [चीन, अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रास] हैं जिसमें अगर किसी ने भी वीटो कर दिया तो पूरी प्रक्रिया रूक जाएगी। चीन ने अभी तक भारत की दावेदारी का समर्थन नहीं किया है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार कमर आगा ने कहा कि अगले दो साल में भारत के स्थायी सदस्य बनने की बहुत कम उम्मीद है क्योंकि महाशक्ति अमेरिका की आर्थिंक स्थिति अच्छी नहीं चल रही है और वहा अगले साल राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए इतना बड़ा फैसला लेना आसान नहीं होगा।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर तुलसी राम का मानना है कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिलना मुश्किल है क्योंकि इसके लिए कई दावेदार हैं। उन्होंने बताया कि यूरोप में जर्मनी, अफ्रीका महाद्वीप में दक्षिण अफ्रीका, लातिन अमेरिका में ब्राजील और आस्ट्रेलिया स्थायी सदस्यता के दावेदार हैं लेकिन पाकिस्तान समेत कई ऐसे देश हैं जो इन देशों का विरोध कर रहे हैं। नटवर सिंह का मानना है कि सुरक्षा परिषद का अगला विस्तार जब भी किया जाएगा उसमें एक मुस्लिम देश जरूर होगा लेकिन मुस्लिम देशों में कौन स्थायी सदस्य बनेगा इसको लेकर झगड़ा है।

वीटो शक्ति के मुद्दे पर कमर आगा ने कहा कि भारत को बिना वीटो के अगर सदस्यता मिलती है तो उसे ले लेना चाहिए और इसके मिलने के तुरंत बाद वीटो शक्ति के लिए प्रयास तेज कर देने चाहिए। इसके विपरीत नटवर सिंह कहते हैं कि भारत बिना वीटो के स्थायी सदस्यता को स्वीकार ही नहीं करेगा। कमर आगा ने कहा कि भारत को इस समय खामोश बैठने के बजाय अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए और पश्चिमी देशों पर दबाव बढ़ाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शाति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और उसे लंबे समय तक सुरक्षा परिषद से बाहर नहीं रखा जा सकेगा।

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