हमारे राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ के रचनाकार रवीन्द्रनाथ टैगोर, मानवीय मूल्यों की गरिमा के गायक और सार्वभौम सामंजस्य के सन्देशवाहक थे. उनकी लेखनी में लोकमंगल, वाणी में विश्वबंधुत्व, विचारों में वसुधैव कुटुम्बकम्, सांसों में साहचर्य, दिल में देशभक्ति और आत्मा में अन्तर्राष्ट्रवाद समाया हुआ था, वे कवि के रूप में ईश्वरीय प्रेम के प्रवक्ता, कथाकार के रूप में कुरीतियों के भंजक, उपन्यासकार के रूप में समाज-सुधार के समर्थक, चित्रकार के रूप में सृजनशीलता के पोषक, शिक्षा शा के रूप में सर्वजन संस्कार के संवाहक, नाटककार के रूप में प्रकृति के प्रभाव तथा प्रतिक्रिया के विश्लेषक, निबंधकार के रूप में नैतिकता के उद्घोषक और दार्शनिक के रूप में सत्यम्, शिवम्, अद्वैतम् के आराधक थे.

रवीन्द्रनाथ टैगोर सर्वजन सुखाय के साधक के रूप में मानवतावाद की मुंडेर पर सामंजस्य का दीप जलाते हैं. सामंजस्य के दीप में द्वेेष की नहीं, बंधुत्व की बाती होती है. वैमनस्य का विष नहीं, समन्वय का ‘स्नेहÓ होता है. सामंजस्य का दीप दुर्भावना की दियासलाई से नहीं जलाया जाता अपितु सद्भावना के सुप्रभाव से स्वत: प्रकाशित हो जाता है. बंधुत्व की बाती से लोक कल्याण की ‘लौÓ उभरती है. लोक कल्याण की ‘लौ’ उभरने से अलगाव का अंधकार हटता है. अलगाव का अंधकार हटने से अपनत्व और प्रेम का प्रकाश फैलता है. प्रेम का प्रकाश फैलने से घृणा का घेरा टूटता है. घृणा का घेरा टूटने से दंभ की दीवारें गिरती हैं. दंभ की दीवारें गिरने से समत्व से साक्षात्कार होता है. समत्व से साक्षात्कार के फलस्वरूप साहचर्य की भावना का उदय होता है. साहचर्य की भावना के उदय से आत्मीयता की अनुभूति होती है.
रवीन्द्रनाथ टैगोर के मत में मानवीय मूल्यों की उपेक्षा करके भौतिकता का आदर करना अनुचित तो है ही अनैतिक भी है. भौतिकता की भट्टïी में सुलगने वाली आपाधापी की आग में संवेदनशीलता के स्वाहा होने का सदैव भय रहता है. भौतिकता वस्तुत: भ्रांति की भूलभुलैया है जो भटकाव लाती है. भटकाव से व्यक्ति का विवेक नष्टï और लक्ष्य भ्रष्टï हो जाता है. जिसका लक्ष्य भ्रष्टï और विवेक नष्टï हो चुका हो उस व्यक्ति से समाज के सृजन का पथ प्रशस्त नहीं हो सकता. हां, ऐसा व्यक्ति समाज को गिरावट के गटर में धकेलने का कार्य आसानी से कर सकता है. सभ्यता के वृक्ष की जड़ों में मानव-प्रेम का पानी चाहिए न कि भौतिक लालसा की छाछ. उनके अनुसार सभ्यता का सार मानव-प्रेम है न कि भौतिक शक्तियों का संचय.
अपने प्रारंभिक दिनों में भले ही टैगोर पश्चिम तथा ईसाइयत से प्रभावित हुए हों किन्तु आगे चलकर उनका यह दृढ़-विश्वास हो गया था कि पश्चिमी सभ्यता भौतिकवाद के झूले में झूलती सभ्यता है जबकि भारतीय संस्कृति नैतिकता के नीर की निर्मल नदी है. भौतिकता की उपलब्धि आरंभ में सुखद किन्तु अन्त में दु:खद होती है जबकि नैतिकता के नीर से सिंचित उपलब्धि सदैव सुखद और स्थायी होती है.

टैगोर के मत में पश्चिम के साम्राज्यवादी परजीवी जन्तुओं की भांति एशिया तथा अफ्रीका की जातियों का रक्त चूस रहे थे और इससे विजयी राष्टï्रों का ही अध:पतन हो रहा था. उनके मत में इस विषय समस्या का आदर्श समाधान यह था कि परमार्थ और आध्यात्मिककता का संदेशवाहक भारत और भौतिकता की भावभूमि पर खड़ा पश्चिम, ये दोनों परस्पर मिले और मैत्री के संबंध स्थापित कर आगे बढ़ें. रवीन्द्रनाथ टैगोर, मनुष्य को सर्वशक्तिमान परमात्मा की सृजनात्मक की ईजल मेंं लगे कैनवास की सर्वोत्तम तस्वीर मानते थे. उनकी मान्यता थी कि ईश्वर मनुष्य के दीपकों को अपने तारों से अधिक प्यार करता है.

वे प्रेम के प्रबल पक्षधर थे. उनकी मान्यता थी कि प्रेम की पेढ़ी पर बैठकर ही मानवतावाद का मंत्रोच्चार किया जा सकता है तथा अंतर्राष्टï्रवाद की अलख जगाई जा सकती है. रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गीतांजलि के द्वारा भारत को विश्व के साहित्यिक मानचित्र में प्रतिष्ठïा और पहचान दिलाई. साहित्य का सर्वप्रथम ”नोबल पुरस्कार” प्राप्ति का गौरव गीतांजलि से ही हमारे देश की उल्लेखनीय उपलब्धियों के खाते में अंकित हो सका. समय का सौदागर, तिथियों की तुलना पर कभी-कभी आश्चर्यजनक संयोग तौल देता है. ”सात” की संख्या, स्वनामधन्य विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के जन्म और मृत्यु के संयोग का ऐसा ही कथानक है. उनका जन्म सन् 1861 की ”सातÓÓ मई को हुआ और देहावसान ”सातÓÓ अगस्त उन्नीस सौ इकतालीस में. सामंजस्य के संदेशवाहक टैगोर, साहचर्य के संविधान- सृजेता थे, इसीलिए वे साहित्य की आसंदी से नैतिकता के न्यायालय में, विश्वास के वकील के रूप में प्यार की दलील देते हुए, मानवता की अपील करते रहे.

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