यह भी एक अवांछनीय राजनैतिक दबाव है कि देश में 15वीं जनगणना के बाद अब स्वतंत्र भारत में पहली बार जातिगणना की जा रही है. सन् 1930 के दशक में ब्रिटिश शासन काल में केवल एक बार ऐसी जाति गणना की थी और बाद में उसका दुष्परिणाम नजर आने के कारण उसे हमेशा के लिये त्याग दिया गया था. अब फिर उसे 2011 में दुहराया जा रहा है. यह सरकारों की बढ़ती और फैलती जा रही आरक्षण नीति का दुष्परिणाम है कि आज देश राजनैतिक पार्टियों की देश की एकता व संविधान की भावना के अनुकूल सार्वजनिक राजनीति न होकर आरक्षण के दुष्प्रभाव के कारण जाति की राजनीति बन गई है. कई दल जाति आधारित ही हो गये हैं.

संविधान निर्माता डॉक्टर अम्बेडकर के संविधान में और उनके जीवन काल में आरक्षण केवल उन वर्गों को ही दिया गया था जो मैला उठाने व जानवरों का चमड़ा निकालने के लिये ‘अछूत’ माने जाते थे. बाद में इसे ‘पिछड़ा वर्ग’ के नाम पर पूरे समाज में फैलाकर देश में बनती और सुदृढ़ होती जा रही भारतीयता को ही जातीयता बना दिया. जातीय गणना एक अभिशाप साबित होगा. पहले जैसे हिन्दू-मुसलमान की समस्या में देश विभाजित होकर पाकिस्तान बन गया, उसी तरह यह आशंका होती जा रही है कि जातीय आधार पर भी देश की राजनीति व सामाजिक व्यवस्था बंट जायेगी. राजस्थान में गूजर व मीणा समुदायों में आरक्षण को लेकर कटुता व हिंसा भड़क रही है. वह सारे देश में देखने में आयेगी. हर वर्ग आरक्षण में अपना सबसे बड़ी संख्या का आरक्षण पाना चाहेगा. इसमें हिंसा, ईष्र्या व कटुता भरी प्रतिस्पर्धायें होंगी.

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