रेलवे में राजनीति ज्यादा होती आ रही है और अर्थनीति ठीक न होने से इस अत्याधिक सम्पत्ति वाले शासकीय उपक्रम ‘भारतीय रेल’ को कभी घाटे, कभी मुनाफे और कभी जन कल्याण का बनाया-बिगाड़ा जा रहा है. श्री लालू यादव के यूपीए प्रथम सरकार में रेल मंत्री बनने से पहले तक रेलवे भारी घाटे में चल रही थी…. श्री लालू यादव की राजनीति ने ऐसा फर्जी चमत्कार बताया कि रेलें बिना किराया बढ़ाये बिना कर्मचारी छंटनी किये मुनाफे का धंधा बन गई. न सिर्फ भारत बल्कि सारी दुनिया में उनके इस करिश्मे का डंका बज गया.

वे मैनेजमेंट गुरु की पदवी पा गये. लेकिन 2009 के चुनाव में उनकी राजनीति बुरी तरह पिट गई और वे सरकार से बाहर हो गये. तब पता चला कि साधारण टू टायर को थ्री टायर बता और सुपर फास्ट के नाम से चार्ज लगा और कुछ हवाई घोषणाओं से रेल मंत्रालय चलाया, रेलों का कोई भी मुनाफा नहीं बढ़ा था. स्वयं श्री लालू यादव ने संसद में यह स्वीकार किया कि उन्होंने 100 आदर्श स्टेशन बनाने की जो योजना घोषित की थी वह महज हवाई थी.

रेलवे बोर्ड ने यात्रा व माल भाड़ा बढ़ाने की अनुशंसा की, लेकिन इस समय ममता बनर्जी रेल मंत्री थीं- उन्होंने अपनी ‘इमेजÓ के लिये किराये व भाड़ा स्थिर रखे. उनके बाद उन्हीं की पार्टी के श्री दिनेश त्रिवेदी रेल मंत्री बने. उन्होंने किराया बढ़ाना उचित समझा और बढ़ा दिया. उससे पहले संसद सत्र में पहले ही सरकारी आदेश से माल भाड़ा बढ़ा दिया. यात्री भाड़ा में ममता बनर्जी की धौंस में ‘रोल बैकÓ किया गया और उन्होंने अपना मंत्री श्री त्रिवेदी भी रोल बैक कर श्री मुकुलराव को नया रेल मंत्री बनाया.

ममता के जन कल्याण के नशे में रेलों का घाटा असहनीय हो गया. लगातार मूल्य वृद्धि के विशेषज्ञ बन चुके प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने रेलवे में भी आर्थिक सुधार व आर्थिक मजबूरी लागू कर रेल की उच्च श्रेणी के यात्री भाड़े बढ़ा दिये और रेल टिकिट पर ‘सर्विस टैक्सÓ भी लगा दिया. यह सब बातें आम आदमी के साथ सरकार की आर्थिक ज्यादतियां ही बन गई हैं. देश में सबसे ज्यादा जमीनी सम्पत्ति फौजों व रेलवे के पास है. आज के युग में जमीन सबसे बड़ी ऐसी संपत्ति है जिसका मूल्य और उपयोग बहुत तेजी से लगातार बढ़ता जा रहा है.

छोटी से छोटी जगहों में ठहरने के लिए लॉज, होटल बन गए हैं. ठहरने का काम सबसे ज्यादा यात्री वर्ग करता है. देश में सबसे ज्यादा यात्री रेलवे के पास ही होते हैं. यदि रेलवे जिनके पास हर स्टेशन पर काफी जमीन होती है यदि वहां नगर के हिसाब से महंगे और सस्ते होटलों, पेड पार्किंग की जगहों व खानपान के होटलों का व्यवसाय शुरू कर दें तो रेलों को इतनी ज्यादा आमदनी होने लगेगी कि उसकी आमदनी रेल किराया-भाड़ा से ज्यादा हो जायेगी.

इससे एक बड़ी समस्या का निदान भी हो जायेगा कि आज रेलों की जमीन पर सबसे ज्यादा झुग्गी बस्तियों का अतिक्रमण है. राजधानी भोपाल तक में नये स्टेशनों का विकास सालों इसलिए अटका रहा कि वहां अतिक्रमण थे. उन्हें हटाने में बरसों लग गए. यदि रेलवे के खुद के उपयोग व आमदनी में जमीन रहेगी तो उन्हें विस्तार योजनाओं में कभी भी इधर से हटाया जा सकता है.

रेलों को यात्री सुविधा के नाम पर हर स्टेशन पर ठहरने व खान-पान के व्यवसाय का जाल बिछा देना चाहिए. इससे सभी लोगों को बहुत सुविधा हो जायेगी. अभी रेलवे कर्मचारियों के आवासीय क्वार्टरों-बंगलों का पुराना ग्राउंड फ्लोर का मकान चलता आ रहा है, इन्हें फ्लैट सिस्टम में परिवर्तित कर हाउङ्क्षसग की बहुत बड़ी जरूरत पूरी करने के साथ ही बहुत बड़ा आमदनी स्रोत बनाया जा सकता है. अब रेलवे को केवल यात्री किराया-भाड़़ा तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि व्यवसायिक हो जाना चाहिए और बेकार, अंडरयूज और अतिक्रमण में दबी जमीनों का पूरा उपयोग करना चाहिए.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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