लंदन, 20 सितंबर.  अपनी पुस्तक  द सैटेनिक वर्सेज पर भारत में प्रतिबंध लगाने की आलोचना के लिए सलमान रुश्दी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को खुला पत्र लिखा है। रुश्दी ने 24 साल बाद अब स्वीकार किया है कि उन्होंने वह पत्र अहंकार व गुस्से भरा था।

भारतीय मूल के लेखक 65 वर्षीय रुश्दी की संस्मरणों पर आधारित किताब मंगलवार को बाजार में आई है। जोसेफ एंटन नाम की 633 पृष्ठों की इस किताब में रुश्दी ने अपने उस दौर के बारे में बताया है जब ईरान की ओर से जारी फतवे से बचने के लिए उन्हें करीब एक दशक तक भटकना पड़ा था। यह फतवा द सैटेनिक वर्सेज के खिलाफ जारी किया गया था। नई किताब में उन्होंने भारत के साथ जुड़ी अपनी भावनाओं के बारे में भी लिखा है।

नई किताब में रुश्दी ने बताया कि उनके पारिवारिक मित्र और लंदन स्थित भारत के तत्कालीन उप उच्चायुक्त सलमान हैदर ने उन्हें औपचारिक रूप से यह बताने के लिए बुलाया था कि भारत में उनकी किताब द सैटेनिक वर्सेज को प्रतिबंधित कर दिया गया है। रुश्दी ने लिखा कि इस प्रतिबंध से उन्हें बहुत पीड़ा हुई थी क्योंकि इससे पहले लिखी गई उनकी किताब मिडनाइट चिल्ड्रेन को भारत में काफी पसंद किया गया था।

उस समय बहुत चर्चित रहे राजीव गांधी को लिखे अपने खुले पत्र को रुश्दी ने माना है कि वह गुस्ताखी थी। उन्होंने कहा है, वह प्रधानमंत्री को फटकार वाला पत्र था। उपन्यासकारों से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जाती। अहंकार में मैंने वह गुस्ताखी की थी। वह पत्र 9 अक्टूबर 1988 को कई जगह प्रकाशित हुआ था। आधिकारिक तौर पर पुस्तक को एहतियात के तहत प्रतिबंधित करने की बात कही गई थी। रुश्दी ने सरकार के इस बयान की अपने पत्र में शिकायत की थी।

रुश्दी ने लिखा था-प्रत्यक्ष रूप से मेरी किताब खुद में ईश-निंदक या आपत्तिजनक नहीं है लेकिन इसी वजह से इसे प्रतिबंधित किया गया है, ऐसा बोलना अच्छा है? स्वस्थ समाज में यह व्यवहार का कोई तरीका नहीं है मिस्टर गांधी। आप भारत पर किस तरह का शासन चाहते हैं- यह खुला समाज हो या दमनात्मक? सैटेनिक वर्सेज पर आपकी कार्रवाई दुनिया के बहुत सारे लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक है। पत्र में इंदिरा गांधी की अपनी आलोचना को लेकर राजीव गांधी पर पुश्तैनी झगड़े के बदले का भी आरोप लगाया गया था।

Related Posts: