महाराष्ट्र , गुजरात , कर्नाटक , हिमाचल प्रदेश ,आंध्र प्रदेश , गोवा , दमन-दीव भारत के ऐसे राज्य हैं , जिनमें शादी का रेजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है। इन राज्यों में शादी के रेजिस्ट्रेशन की नियमावली बना ली गई है। जिन राज्यों में शादी का रेजिस्ट्रेशन जरूरी है , वहां इसके बड़े फायदे देखने को मिले हैं।

इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि पूरे देश में सभी धर्मों की शादियों का रेजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होना चाहिए। कैसे होता है रेजिस्ट्रेशन 1. अगर शादी सामान्य रीति-रिवाज के मुताबिक हुई हो। शादी की फोटॉग्राफ व इनविटेशन कार्ड के साथ अदालत में रेजिस्ट्रेशन के लिए अप्लाइ कर दें। कोर्ट में दोनों पार्टनर्स को अपना-अपना एज सर्टिफिकेट और एक ऐफिडेविट पेश करना होता है कि दोनों की पहले शादी नहीं हुई है या हुई है तो पति या पत्नी की मौत हो गई है या उनका तलाक हो गया है। 2. अगर शादी आर्य समाज मंदिर में हुई हो। आर्य समाज मंदिर से सर्टिफिकेट लेकर कोर्ट में रेजिस्ट्रेशन की अर्जी दे दें। इस केस में भी शादी का फोटॉग्राफ , एज सर्टिफिकेट , रेजिडंस प्रूफ और एक ऐफिडेविट पेश करना होगा कि दोनों का पहले विवाह नहीं हुआ है या हुआ है तो पति या पत्नी की मौत हो गई है या उनका तलाक हो गया है।

3. अगर जोड़ा सीधे कोर्ट में अर्जी दे। शादी करने वाला जोड़ा मैरिज रजिस्ट्रार के यहां सीधे-सीधे भी आवेदन कर सकता है। इसमें नीचे बताए गए कुछ जरूरी कागजात के साथ एक महीने का नोटिस दिया जाता है। सारे कागजात और तथ्य सही पाए जाने पर रजिस्ट्रार 2 गवाहों के सामने रजिस्टर पर दस्तखत कराता है और एक-दूसरे को माला पहनाकर शादी हो जाती है। इस स्थिति में जिन कागजात की ज़रूरत होती है , वे हैं – वर-वधू के तीन-तीन पासपोर्ट साइज फोटो , उनके एज सर्टिफिकेट और रेजिडंस प्रूफ , जिससे जूरिडिक्शन तय हो सके , स्थायी पता , जहां नोटिस भेजकर पता लगाया जा सके कि किसी को इस शादी पर आपत्ति है या नहीं , एक ऐफिडेविट कि दोनों पार्टनर अकेले हैं और उनका कोई जीवित पति या पत्नी नहीं है या वे कुंआरे , विधवा/विधुर या तलाकशुदा हैं।

रेजिस्ट्रेशन के फायदे महिलाओं के लिए सुरक्षा कवच। बाल-विवाह पर रोक लगेगी। बिना सहमति होने वाली शादियों पर लगाम लगेगी। एक से ज्यादा शादी करने पर रोक लगेगी। शादीशुदा स्त्रियों को अपनी ससुराल में रहने और भरण-पोषण का हक पाने में मदद मिलेगी। विधवाओं को पति की जायदाद पर दावा मजबूत करने के लिए मजबूत कानूनी सहारा रहेगा।
शादी के बाद पुरुष अपनी पत्नियों को छोड़ नहीं पाएंगे। माता-पिता और अभिभावकों द्वारा बेटियों को विवाह के नाम पर बेचने का सिलसिला रुकेगा और बच्चों का भविष्य अच्छा होगा। अदालतों में आए दिन ऐसे केस भी आते हैं , जिनमें यह तय करना होता है कि शादी हुई या नहीं या फिर शादी की वैधता क्या है।

रेजिस्ट्रेशन जरूरी हो जाने के बाद ऐसे मुकदमों में कमी आएगी। क्या कहते हैं तमाम ऐक्ट हिंदू मैरिज ऐक्ट 1955 की धारा 8 में शादी का रेजिस्ट्रेशन कराना या न कराना इच्छा पर निर्भर करता है। मुस्लिम मैरिज में भी कुछ राज्यों की नियमावली में रेजिस्ट्रेशन मन की इच्छा पर निर्भर है। क्रिश्चन मैरिज ऐक्ट 1872 , स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 और पारसी मैरिज एंड डिवॉर्स ऐक्ट 1936 में शादी का रेजिस्ट्रेशन जरूरी है। कश्मीर में मुस्लिम धर्म वालों के लिए जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम मैरिज रेजिस्ट्रेशन ऐक्ट 1981 के मुताबिक निकाह के 30 दिन के अंदर शादी का रेजिस्ट्रेशन जरूरी कर दिया गया है। दिल्ली सरकार ने शादी का रेजिस्ट्रेशन कुछ आसान बना दिया है। पहले गवाहों में एक राजपत्रित अधिकारी की जरूरत होती थी , लेकिन अब एक पैन कार्ड या वोटर कार्ड वाला व्यक्ति भी रेजिस्ट्रेशन का गवाह बन सकता है।

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