सन् 1950 में 26 जनवरी को लागू भारत के संविधान के साथ ही 15 अगस्त 1947 को पायी आजादी में सर्व प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य की शासन व्यवस्था प्राप्त हो गई जिसमें सभी लोगों को मूलभूत अधिकार प्राप्त हुए. अब यह हम देशवासियों का दायित्व है कि हम अपने मूलभूत मौलिक अधिकारों का उपयोग व उपभोग करें.

इन अधिकारों के साथ ही हम सभी पर यह दायित्व भी आ गया है कि हम देश की आजादी और संविधान की मान मर्यादा की रक्षा करें. हमारा सबसे बड़ा व अनिवार्य दायित्व यह है कि हमारे किसी भी कृत्य से किसी दूसरे के मूलभूत मौलिक अधिकारों का हनन न हो और हम अपने भी इन अधिकारों का हनन न होने दें. मूलभूत अधिकार व्यक्तिगत होने के साथ-साथ सामूहिक व सामाजिक स्वरूप के भी होते हैं. हमारे अधिकारों में एक है आवागमन की स्वतंत्रता (फ्रीडम ऑफ मूवमेंट) इस अधिकार का देश में हम लोग सबसे ज्यादा उल्लंघन करते हैं.

सड़कों पर धरना व चक्का जाम लगा दिया. रेल, बस, यातायात किसी मांग व आंदोलन से बाधित कर देना. किसी भी व्यक्ति, समूह, संगठन या राजनैतिक पार्टी की मांग या आंदोलन उनका स्वयं का है. वह राष्टï्रीय व सामाजिक रूप में सभी अन्य लोगों की मांग नहीं है. लेकिन वे अन्य सभी लोगों के आवागमन की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन कर देते हैं. लोगों का यह मूलभूत अधिकार है कि वे अपनी आजीविका के लिए कोई वैध धंधा व्यवसाय या नौकरी करें. आए दिन ”बंद” आंदोलनों मे लोगों से जाकर दुकानें बंद कराई जाती हैं लोग नुकसान व तोडफ़ोड़ की दहशत व गुंडागिरी की वजह से भी दुकानें बंद करते हैं.

जो ”बंद” चाहते हैं वे अपना घर-किचन-धंधा आवागमन बंद करें. दूसरों पर उसे लागू करने का अधिकार संविधान ने उन्हें नहीं दिया है. बम्बई हाईकोर्ट ने एक बार भारतीय जनता पार्टी व ïिशवसेना पर ”मुम्बई बंद” करने के लिए 20-20 लाख रुपयों का अर्थदंड लगाया गया. इसके बाद भी देश में ‘बंद’ होते जा रहे हैं. केरल की राजधानी तिरुवन्तपुरम में एक दुकानदार ने ‘बंद’ के दौरान जबरदस्ती उसकी दुकान बंद कराने पर अपनी लाइसेंसी रिवाल्वर से दो लोगों को जान से मार दिया.

पुलिस ने उस पर हत्या का मामला चलाया. ट्रायल कोर्ट ने आरोप से बरी कर दिया. हाईकोर्ट ने उसे ‘हत्या’ में सजा दे दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला सही मानते हुये उन्हें इस बात पर ससम्मान बरी कर दिया कि हर व्यक्ति को अपनी प्रापर्टी व्यवसाय करने का मौलिक मूलभूत अधिकार है. न्यायालय अपने फैसलों में दिशा निर्देश तय कर रहे हैं, लेकिन हम लोग उस सही दिशा में नहीं जा रहे हैं. आज भी बंद के रूप में लोगों का आना-जाना, धंधा-व्यवसाय करना रोका जा रहा है. यह भी मूलभूत अधिकार है कि लोग प्रदर्शनों में अपने विचार व विरोध कर सकते हैं, लेकिन व्यवहार में यह हो रहा कि प्रदर्शनों से दूसरों के मौलिक अधिकार भंग करने में लगे हैं.

दिल्ली कांड में यह देखने में आ गया कि अदालतों ने 5 बलात्कार के अपराधियों को मृत्युदंड की सजा दी. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उसे एक महिला राष्टपति श्री प्रतिभा पाटिल से माफी दिला दी. सरकार ने भी अनैतिक अपराध कर डाला और राष्टपति के माफी देने के संविधानिक अधिकार का दुरुपयोग हो गया. गणतंत्र पर भीड़तंत्र इतना हावी होता जा रहा है कि उसमें संविधान व लोगों के मूलभूत मौलिक अधिकारों का ही हनन बढ़ता जा रहा है. दिल्ली कांड पर ही दिल्ली के युवा लड़के, लड़कियों ने संवैधानिक अधिकारों पूरी मान मर्यादा से ऐसे प्रश्न पर आदर्श रूप से आक्रोश प्रतिकार व विरोध किया कि आज पूरा देश उन युवाओं के प्रति नतमस्तक है कि उन्होंने राष्टï्र को एक बहुत ही ज्वलंत प्रश्न पर जगा दिया, लेकिन दिल्ली पुलिस ने उस आदर्श प्रतिकार को दफा 144, लाठी चार्ज, आंसू गैस व स्वयं पथराव कर लोगों के मूलभूत अधिकारों का हनन कर दिया.

उन्हीं के प्रतिकार पर आज कमेटी, कमीशन, फास्ट ट्रेक कोर्ट और संसद द्वारा कड़े कानून बनाने की अनिवार्यता आ गयी है. दिल्ली हाईकोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेकर यह पूछा कि युवाओं के मर्यादित व शांतपूर्ण प्रतिकार व प्रदर्शनों को क्यों रोका गया दफा 144 व लाठी चार्ज की कोई जरूरत ही नहीं थी- वह क्यों किया गया. केन्द्र सरकार गृहमंत्री श्री शिन्दे व दिल्ली पुलिस को अपने बचाव में सिर्फ झूठ ही बोलना पड़ा कि बैरीकेट्स तोड़े गये, पथराव हुआ, कान्सटेबिल को मार डाला. जब सब टी.वी. चैनलों पर दिख रहा था ऐसा कहीं कुछ नहीं किया गया था.

इस 63वें गणतंत्र पर सरकार व आम जनता यह संकल्प ले कि वह स्वतंत्रता, जनतंत्र व गणतंत्र को भीड़तंत्र नहीं बनने देगी. वे अपने मौलिक अधिकारों का पूरा उपयोग करेंगे और सजग रहेंगे कि उनसे दूसरों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं होगा. अब कोई भी पार्टी या संगठन ‘बन्द’ का आन्दोलन नहीं करेगा. सड़कों पर चक्काजाम नहीं किये जायेंगे. आवागमन के सभी साधन बस, रेल, निजी वाहन निर्बाध चलते रहेंगे. हमें यह भान होना ही चाहिए कि हम स्वतंत्र व गणतंत्र हैं, जिसमें सरकार व प्रजा अलग-अलग नहीं होते. राष्ट्र की सम्पत्ति हमारी हो, तोडफ़ोड़ नहीं करेंगे. सिर्फ कानून बना देने या उनकी संख्या बढ़ा देने से कुछ नहीं होने वाला. सबसे ज्यादा जरूरी है कि उन पर अमल किया जाये.

 

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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