केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून बना दिया और राज्यों के सरकारों के सुपुर्द यह काम हो गया कि वे उसे अपने राज्यों में लागू करें. इसके खर्च में केंद्र सरकार का भी अंशदान हो रहा है. लेकिन प्रारंभ में ही सभी राज्यों ने यह गुहार लगाई थी कि प्राथमिक व मिडिल शिक्षा का यह काम इतना बड़ा व व्यापक है कि राज्यों को केंद्र से काफी फंड दिया जाना चाहिए. कई जगहों पर स्कूल भवन तक नहीं थे. शिक्षकों का भी भारी अभाव था.
शिक्षा सत्र चालू हुए 5 महीने का समय बीत चुका है. अभी भी इस मामले में स्थिति कई स्तरों पर काफी पीछे है या लागू नहीं की जा रही है.  निजी स्कूलों के लिये प्रावधान है कि ये 25 प्रतिशत बच्चे प्रथम कक्षा में नि:शुल्क भर्ती करेंगे. ऐसे कई निजी स्कूलों ने अपने रजिस्टरों में ऐसे बच्चे निर्धारित प्रतिशत में दर्शा दिये. लेकिन वहां उन बच्चों को कोई शिक्षा नहीं दी जा रही है. उन्हें घर का रास्ता दिखा दिया. शासन की ओर से कहा तो यही गया था कि स्कूल जाने के लिये घर-घर जाकर बच्चों को खोजा जायेगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. अभी भी कई बच्चे बाल श्रमिक के रूप में काम कर रहे हैं और स्कूल नहीं जाते हैं.
सभी सरकारी निजी स्कूलों से कहा गया था कि वे प्रशिक्षित शिक्षकों को ही तैनात करेंगे. अन्यथा उसकी मान्यता खत्म कर दी जायेगी. ऐसा प्रतीत हो रहा है यदि शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों का इस आधार पर कड़ाई से निरीक्षण किया जाए तो सैकड़ों स्कूलों की मान्यता रद्द करनी पड़ेगी. निरीक्षण में यह बात भी सिद्ध हो जायेगी कि 25 प्रतिशत के प्रावधान के तहत जिन बच्चों का दाखिला रजिस्टर में दिखाया गया है ये फर्जी है या स्कूल में आते ही नहीं है.  मध्यान्ह भोजन की योजना सरकारी-गैर सरकारी स्कूलों में कभी भी कहीं भी ठीक से नहीं चला पा रही है. कंपनियों को भी टेंडर निकालकर यह काम सौंपा गया कि व्यापारिक स्तर पर यह काम सुचारू रूप से हो जायेगा. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है. राजधानी भोपाल सहित कई नगरों में ऐसे खाने में मेंढक, इल्ली निकलने के प्रकरण सामने आये हैं. इतनी बड़ी योजना के क्रियान्वयन में बच्चों के मां-बाप को भी रुचि व जिम्मेदारी  लेनी चाहिए.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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