सात दशक से अधिक के अपने संगीतमय सफर में लता मंगेशकर ने अपने बनाए मानदंडों के साथ कभी समझौता नहीं किया. अश्लील गीतों से गुरेज उन्हें आज ही नहीं बल्कि करियर के शुरूआती दौर से रहा और कई बार तो उन्होंने गीतों के बोल ही बदलवा दिए.

सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के साथ अनुभवों को अपनी नई किताब लता मंगेशकर – ऐसा कहां से लाउं में समेटने वाली डोगरी कवयित्री और हिन्दी की मशहूर लेखिका पदमा सचदेव ने ऐसे कई वाकयात को कलमबद्ध किया है जब इस महान पाश्र्वगायिका ने गीतों के गिरते स्तर पर चिंता जताई. सत्तर के दशक में शंकर जयकिशन के साथ आंखों आंखों में के एक गीत की रिकार्डिंग थी लेकिन लता ने पंक्ति में चोली शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताकर गाने से इनकार कर दिया. इसके बाद निर्माता जे ओमप्रकाश ने गाने के बोल ही बदलवा दिए.

अश्लील गीतों के बारे में लता ने कहा कि संगीत अश्लील नहीं होता, शब्द अश्लील होते हैं. कवियों को गीत के बोल चुनते समय सावधानी बरतनी चाहिए. कई गायक इस तरह के गीत गा लेते हैं लिहाजा मेरे अकेले के ना गाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. उन्होंने उस दौर में अहमदाबाद में एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि जहां तक बन पड़ता है, मैं अश्लील गीत नहीं गाती. लेकिन मैं दूसरों को कैसे रोक सकती हूं. किताब में मोहम्मद रफी, हेमंत कुमार, मन्ना डे, आशा भोसले, आर डी बर्मन जैसे कलाकारों के साथ रिकॉर्डिंग के अनुभव और आलोचनाओं पर लता के नजरिये को भी लेखिका ने पूरी शिद्दत से लिखा है. किताब का विमोचन कल होना है.

अब भले ही किसी को यकीन ना हो लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब महीने भर रिहर्सल के बाद भी गाना लता से गवाया नहीं जाता था. इसका जिक्र करते हुए लता ने किताब में कहा है कि जब मैं इंडस्ट्री में नई आई थी तब कितनी ही नामी गायिकायें थी. उन दिनों एक गाने की रिहर्सल महीने भर तक होती थी. इसके बाद भी गाना कोई और गा लेता था तो दुख होता था. पर कुछ कह नहीं सकते थे. जद्दोजहद के उस दौर में भी हौंसला बुलंद रहता. कर्नाटक शैली की महान गायिका एम एस सुब्बुलक्ष्मी से लता की मुलाकात का विवरण भी किताब में है. कोकिलकंठी सुब्बुलक्ष्मी मुंबई आई थी और लता उनसे मिलने गई. लता ने सुब्बुलक्ष्मी के बारे में कहा कि उन्होंने मीरा के भजन इतने सुंदर गाये हैं कि उन्हें सुनने के लिए मैंने मीरा फिल्म 15 बार देखी. वह ऐसी सुरीली हैं कि कहीं से भी आवाज उठा ले, सुर में ही उठती है.
यही नहीं उस मुलाकात में लता ने सुब्बुलक्ष्मी से कर्नाटक संगीत सीखने की इच्छा भी जाहिर की थी. किशोर कुमार के साथ रिकॉर्डिंग के दौरान जहां मजाक मस्ती का आलम रहता तो रफी बहुत कम बोला करते थे.

अपने दौर के कलाकारों की मुरीद लता ने कहा था कि रफी साहेब निहायत मुहज्जब आदमी हैं. कम बोलना उनकी आदत में शुमार है. मैंने कितने अच्छे कलाकारों के साथ काम किया.
गीतादत्त, गौहरबाई, शमशाद बेगम, राजकुमारी और भी कई. कितने सादा लोग थे लेकिन आज की पीढ़ी में वैसे लोग नहीं हैं. नूरजहां की प्रशंसक लता को शहंशाह ए गजल मेहदी हसन की शैली भी बहुत पसंद थी. मेहदी हसन जब मुंबई आये थे तब उन्होंने लता के हस्ताक्षर की हुई तस्वीर मांगी थी.

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