• लोकायुक्त एन. के. मेहरोत्रा ने मिश्र को पद से हटाने की सिफारिश की है

लखनऊ, 5 अक्टूबर. उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने बुधवार को लोकायुक्त की जांच रिपोर्ट में भ्रष्टाचार के दोषी करार दिए गए राज्य के माध्यमिक शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र और ऐसे ही आरोपों से घिरे श्रम मंत्री बादशाह सिंह को पद से हटा दिया तथा दोनों के विरुद्ध सतर्कता अधिष्ठान से जांच कराने के आदेश दिए।

प्रदेश में सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी [बसपा] की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने मुख्यमंत्री के इस निर्णय की जानकारी देते हुए बताया कि लोकायुक्त एन. के. मेहरोत्रा ने मिश्र के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में मुकदमा दर्ज करने और उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की है। इसके अलावा श्रम मंत्री पर भी भ्रष्टाचार के गम्भीर इल्जाम लगाए गए हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री मायावती ने इन हालात के मद्देनजर दोनों मंत्रियों को तब तक पद से हटा दिया है, जब तक उन पर लगे आरोपों की सतर्कता अधिष्ठान की जांच पूरी नहीं हो जाती और वे निर्दोष साबित नहीं हो जाते। मौर्य ने बताया कि मिश्र और सिंह को मंत्री पद से इसलिए हटाया गया है ताकि उनके खिलाफ जांच प्रभावित न हो और विपक्षी पार्टियों को अनावश्यक राजनीति करने का मुद्दा नहीं मिले।

उन्होंने कहा कि इन दोनों मंत्रियों से साफतौर पर कह दिया गया है कि वे खुद पर लगे आरोपों के मामले में कानूनी लड़ाई लड़ें और अगर अदालत में वे निर्दोष साबित होते हैं तो उन्हें बाइज्जत उनके पद पर बहाल कर दिया जाएगा। गौरतलब है कि प्रदेश के लोकायुक्त न्यायमूर्ति एन. के. मेहरोत्रा ने कल प्रदेश के माध्यमिक शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र के विरुद्ध आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में दर्ज शिकायत को सही करार देते हुए उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार उन्मूलन अधिनियम के तहत आपराधिक वाद दर्ज करके जांच कराए जाने और जांच पूरी हो जाने तक उन्हें मंत्रिपरिषद से हटा दिए जाने की संस्तुति की थी। लोकायुक्त ने मिश्र को ग्राम सभा की जमीन पर कब्जे का भी दोषी करार दिया है और उनका कब्जा हटवाने तथा उनके विरुद्ध समुचित दण्डात्मक कार्रवाई की सिफारिश की है। भदोही के एक अधिवक्ता स्वामी प्रसाद मौर्य ने दस महीने पहले दर्ज एक शिकायत में माध्यमिक शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र के विरुद्ध आय से अधिक सम्पत्ति होने, ग्राम सभा की जमीन पर कब्जा करने और नियुक्तियों में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व न्यायमूर्ति मेहरोत्रा ने दुग्ध विकास मंत्री अवधपाल सिंह यादव तथा धर्मार्थ कार्य राज्यमंत्री राजेश त्रिपाठी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले में जांच एवं मंत्रिपरिषद से हटाए जाने की संस्तुति की थी. जिस पर सरकार ने अमल किया था। गौरतलब है कि मायावती सरकार में पद के दुरुपयोग और आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने वाले मंत्रियों की संख्या बढ़ती जा रही है। धर्मार्थ कार्य राज्य मंत्री राजेश त्रिपाठी, पशुधन एवं दुग्ध विकास मंत्री अवध पाल सिंह के बाद इस सूची में शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र का नाम भी शामिल हो गया है।

लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा ने मिश्र को आय से अधिक संपत्ति मामले में दोषी करार देते हुए सरकार से उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की है। साथ ही मिश्र के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज सीबीआई या अन्य किसी एजेंसी से जांच की संस्तुति की है। मिश्र के खिलाफ ऐसा ही मामला हाईकोर्ट में भी है। रंगनाथ के खिलाफ भदोही के स्वामी नाथ मिश्र ने अगस्त 2010 में लोकायुक्त के यहां परिवाद दाखिल कर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने, विधायक निधि के दुरुपयोग व रिश्वत लेकर विद्यालयों में अनियमित नियुक्तियों,भदोही में ग्रामसभा की जमीन पर कब्जे के आरोप लगाए थे। लोकायुक्त ने सरकार को भेजी रिपोर्ट में कहा है कि मिश्र ने मंत्री रहते इलाहाबाद के टैगौर टाउन में 80 लाख का मकान खरीदा, जिसकी बाजार कीमत डेढ़ करोड़ से भी ज्यादा है। भदोही व अन्य स्थानों पर भी संपत्तियां है, जिसका सर्किल रेट चार करोड़ 46 लाख से अधिक है। मंत्री ने बताया है कि ये संपत्तियां ट्रस्ट-समितियों ने खरीदी हैं। उन्होंने शिक्षण संस्थाओं से अपनी आय 30-35 लाख सालाना बताई, पर इनकम टैक्स रिटर्न से यह बात साबित नहीं हुई।

रिपोर्ट में ग्रामसभा की भूमि पर कब्जे के मामले में मिश्र के खिलाफ यूपी जमींदारी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर जांच को कहा गया है। लोकायुक्त का कहना है कि मिश्र 84 लाख की आय का हिसाब नहीं दे सके। वहीं, मिश्र का कहना है कि मैंने 2007 के चुनाव में आय का जो ब्योरा दाखिल किया था, यदि उससे ही आज की संपत्तियों का मिलान करें, तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। इलाहाबाद का बंगला लोन पर है। लोकायुक्त ने 16 अगस्त को अवध पाल को दोषी मानते हुए पद से हटाने की संस्तुति की थी। अवधपाल को अंतत: पद से इस्तीफा देना पड़ा था। बाद में उन्हें पार्टी से भी निकाल दिया था। इससे पूर्व 25 दिसंबर 2010 को लोकायुक्त की रिपोर्ट पर राजेश त्रिपाठी से मंत्री पद छिना था।

आरोपों की पुष्टि से मुश्किल में माया
-लोकायुक्त की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र पर भ्रष्टाचार के आरोपों की पुष्टि के बाद विपक्ष को बसपा सरकार पर हमला करने का एक और मौका मिल गया है। भाजपा, सपा और कांग्रेस ने सरकार पर मंत्रियों के बचाव का आरोप लगाते हुए नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग की है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने कहा कि लोकायुक्त के फैसले ने साबित कर दिया है कि राज्य सरकार का पूरा मंत्रिमंडल भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। पहले राजेश त्रिपाठी, फिर अवधपाल और अब रंगनाथ मिश्र के अलावा कई सांसद और विधायक भी तमाम आरोपों में घिरे हुए हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा ने अपनी पुस्तक में राज्य सरकार के भ्रष्टाचार का खुलासा किया है। इसमें दो लाख 54 हजार करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाया गया है।

शाही ने कहा कि जिस प्रदेश में मुख्यमंत्री नोटों की माला पहनती हों, वहां भ्रष्टाचार की स्थिति का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।
सपा ने कहा है कि केंद्र को अब मायावती सरकार को ही बर्खास्त कर देना चाहिए। सपा प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा कि लोकायुक्त की सिफारिश और सीबीआई जांच के घेरे में आने पर कई मंत्री हटे या हटाए गए हैं। हत्या, लूट, अपहरण और बलात्कार के मामलों में अब तक आधा दर्ज से ज्यादा मंत्री और बसपा विधायक जेल जा चुके हैं। ऐसे में केंद्र सरकार को नियम 356 का इस्तेमाल कर पूरे राच्य सरकार को बर्खास्त कर देना चाहिए।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता वीरेंद्र मदान ने भी कहा कि लगातार मंत्रियों के भ्रष्टाचार के मामले सामने आने से इस सरकार की कलई खुल गई है। साफ है कि सरकार के अधिकांश मंत्री किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार से जुड़े हैं, लेकिन सरकार अपने नैतिक कर्तव्यों को दरकिनार कर अपने भ्रष्ट मंत्रियों के बचाव की कोशिश करती रही है। ऐसे में मुख्यमंत्री को खुद नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए।

कई और मंत्री हैं जांच दायरे में
प्रदेश सरकार के कई और मंत्री जांच के दायरे में हैं। श्रम मंत्री बादशाह सिंह के खिलाफ सरकारी जमीन पर कब्जे का मामला चल रहा है। उद्यान मंत्री नारायण सिंह के खिलाफ भी परिवाद दाखिल है। संस्कृति मंत्री सुभाष पांडेय पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। इनमें से बादशाह सिंह और सुभाष पांडेय का बसपा ने टिकट भी काट दिया है। उच्च शिक्षा मंत्री राकेश धर त्रिपाठी के खिलाफ पहले एक परिवाद दाखिल किया गया था जिसमें याची ने मामला वापस ले लिया था। अब उनके खिलाफ एक नयी शिकायत दाखिल हुई है।
औराई [भदोही] से विधायक रंगनाथ मिश्र के खिलाफ लोकायुक्त की रिपोर्ट आने के बाद से ही उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इस बार बसपा ने उन्हें मिर्जापुर से प्रत्याशी बनाया था। अब उनका टिकट बरकरार रहेगा या नहीं, इस पर अटकल लगने लगी है। अवधपाल पाल सिंह यादव, सुभाष पांडेय का टिकट काट दिया गया है।

बसपा विधायक शेर बहादुर की सदस्यता खत्म
उत्तर प्रदेश की 15वीं विधानसभा में दलबदल कानून के तहत एक और विधायक की सदस्यता खत्म कर दी गई है। यूपी विधानसभा के अध्यक्ष सुखदेव राजभर ने दलबदल के मामले में बसपा विधायक शेर बहादुर सिंह की सदस्यता समाप्त कर दी। सिंह 25 जुलाई 2011 को बसपा छोड़कर सपा में शामिल हो गए थे। अंबेडकर नगर की जलालपुर विधानसभा सीट से विधायक सिंह की सदस्यता इसी दिन खत्म की गई है। इससे पहले बाराबंकी के मसौली विधानसभा क्षेत्र के बसपा विधायक फरीद महफूज किदवई भी सपा में शामिल होने के कारण विधानसभा की सदस्यता गवां चुके हैं। अब बसपा विधायकों की संख्या घटकर 224 रह गई है।

राजभर ने बताया कि शेर बहादुर सिंह के खिलाफ बसपा प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य की याचिका पर संबंधित पक्षों को सुनने के बाद यह निर्णय किया गया। विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे ने बताया कि मौर्य ने सपा में शामिल होने वाले दो अन्य बसपा विधायकों सतीश वर्मा और भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित के खिलाफ भी दलबदल कानून के तहत याचिका दाखिल कर रखी है। फिलहाल इन दोनों मामलों में सुनवाई जारी है। विधानसभा अध्यक्ष ने बताया कि शेर बहादुर सिंह की सदस्यता 25 जुलाई से समाप्त मानी जाएगी। सिंह को विधायक कार्यकाल के हिसाब से पेंशन मिलती रहेगी। जबकि नियमानुसार सदस्यता खत्म होने की तारीख के बाद से अब तक विधायक के तौर पर मिली धनराशि उन्हें वापस करनी होगी।

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