नई दिल्ली, 2 अप्रैल. सेना प्रमुख द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखी अतिगोपनीय और संवेदनशील चिट्ठी के लीक होने के मामले में आईबी ने जनरल वीके सिंह को क्लीन चिट दे दी है। वहीं, दिल्ली में आज रक्षामंत्री की तीनों सेनाध्यक्षों के साथ एक अहम बैठक हुई।

बताया जा रहा है कि इस बैठक में नए हथियारों की खरीद पर चर्चा हुई। इस बैठक में रक्षा सचिव के अलावा डिफेंस एकवेजि़शन काउंसिल के डीजी भी शामिल थे। घूस की पेशकश का खुलासा और प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी के लीक होने के बाद आज पहली बार सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने रक्षा मंत्री एके एंटनी से मुलाकात की।

आर्मी चीफ और रक्षा मंत्री के बीच क्या बात हुई इस बात का अभी पता नहीं चल सका हैं।
इससे पहले वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने यह साफ करने की कोशिश कि थी सरकार और सेना के बीच कोई विवाद नहीं है। उन्होंने साफ किया था कि सेना और सरकार के बीच कोई मतभेद नहीं है। रक्षा मंत्री एके एंटनी ने भी कहा था कि सरकार और सेना के तीनों अंगों में कोई मतभेद नहीं है और सबकुछ ठीकठाक है। रक्षा मंत्री से यह मुलाकात जनरल ने अपने नेपाल दौरे से ठीक पहले की है। जनरल 4 अप्रैल को नेपाल में आयोजित एक सेमीनार में हिस्सा लेने जा रहे हैं। रक्षा मंत्रालय ने जनरल का दौरा छोटा कर दिया था। आर्मी चीफ ने नेपाल दौरे के लिए चार दिन का वक्ता मांगा था लेकिन रक्षा मंत्रालय ने उनका दौरा 2 दिन का कर दिया था।

ऋषि पर सीबीआई ने कसा शिकंजा

नई दिल्ली. टाट्रा ट्रक सौदे की साजिश 1997 में ही रच गई थी। जब चेक गणराज्य की मूल कंपनी के विभाजन के बाद इंग्लैंड की टाट्रा कंपनी से ट्रकों की खरीद का करार किया गया। इस संबंध में सीबीआइ को अहम सबूत मिले हैं और वह टाट्रा के मालिक रवि ऋषि से आगे की पूछताछ कर घोटाले की कडिय़ां जोडऩे में जुटी हुई है। रवि ऋषि के खिलाफ सीबीआइ का शिकंजा कसता जा रहा है। ऋषि के देश से बाहर जाने का रास्ता बंद करने के बाद उन पर गिरफ्तारी का खतरा मंडराने लगा है। सीबीआइ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि टाट्रा ट्रकों की डील में घोर अनियमितता के सुबूत मिले हैं और इसके लिए बीईएमएल, सेना और रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के साथ-साथ ऋषि समान रूप से जिम्मेदार है।

इस मामले में सीबीआइ ने सोमवार को नए सिरे से ऋषि से पूछताछ की। नियमों के मुताबिक सेना की खरीद में किसी बिचौलिए की भूमिका नहीं होनी चाहिए थी। 1986 में टाट्रा ट्रकों के सौदे में यही हुआ था। यह सौदा सीधे टाट्रा ट्रक बनाने वाली चेक कंपनी से किया गया था। जब 1997 में इसके लिए नए सिरे से कोशिश हुई, तो मूल कंपनी के बजाय इंग्लैंड की टाट्रा कंपनी से करार कर लिया गया, जिसके मालिक रवि ऋषि हैं। मजेदार बात यह है कि टाट्रा ट्रक बनाने वाली मूल कंपनी का अधिकांश मालिकाना हक ऋषि के पास है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि घोटाले की शुरुआत यहीं से हुई। सीबीआइ के अनुसार रवि ऋषि अपनी ही कंपनी से बनने वाले टाट्रा ट्रकों को दोगुनी कीमत पर बीईएमएल को बेचने लगा, जो बाद में सेना तक पहुंचते थे। इस पूरे खेल में बीईएमएल, रक्षा मंत्रालय और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों समेत सभी का हिस्सा बंटा था। यही कारण है कि 2011 में 600 टाट्रा ट्रकों की खरीद को हरी झंडी देने के लिए सेनाध्यक्ष वीके सिंह को 14 करोड़ रुपये की रिश्वत की पेशकश की गई थी। सीबीआइ सूत्रों के अनुसार घोटाले की साजिश इस तरह रची गई कि जिससे किसी को संदेह नहीं हो।

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