सोलह शृंगार से सजी महिला के नख से शिख तक खूबसूरती टपकती है। त्योहारी माहौल में तो इन शृंगारों का महत्व और भी बढ़ जाता है। जानिए भारतीय संस्कृति में सोलह शृंगार कौन-कौन से हैं व क्या है इनकी खासियतें

महिला और शृंगार का चोली-दामन का साथ रहा है। यही वजह है कि भारतीय संस्कृति में सोलह शृंगार का खासा महत्व है। एक महिला को नख से शिख तक सजाने वाले इन सोलह शृंगारों की अहमियत त्योहारों में और और बढ़ जाती है। इस मौके पर महिलाएं विभिन्न शृंगारों में कई तरह की तब्दिलियां आई हैं और कुछ शृंगार तो ऐसे हैं, जिनकी पारंपरिक शृंगार-पद्धति आज भी कायम है। भले ही इनके रूप और नाम बदल गए हों।

उबटन

सोलह शृंगार में सबसे पहला शृंगार है उबटन। इससे त्वचा और चेहरे की कांति बढ़ती है। उबटन के लिए एक विशेष प्रकार का लेप तैयार किया जाता है। यह लेप हल्दी, हार, सिंगार के फूल, बेसन, गाय के दूध आदि को मिलाकर तैयार किया जाता है। महिलाएं इस लेप को पंद्रह मिनट के लिए अपने शरीर पर लगाती हैं और अपने हाथों से इसे रगड़कर हटाती हैं। इससे त्वचा के रोग, झाइयां और दाग धब्बे दूर हो जाते हैं।

स्त्रान

मौसम के अनुसार शीतर या गुनगुने पानी से स्त्रान किया जाता है। नहाने के पानी में गुलाब, केवड़ा, खस, नीबू का रस आदि खूशबूदार द्रव मिलाते हैं। इससे शरीर स्वस्छ तो रहता ही है, साथ ही ताजगी भी महसूस होती है।

वस्त्र धारणा

आज जहां कई तरह की डिजाइनर ड्रेसेज पहनकर महिलाएं अपना रूप संवारती हैं, वहीं यह शृंगार के तहत मलमल, मखमल, रेशम के रंगीन वस्त्र लहंगा, कंचुकी और उतरीय पहने जाते हैं।

केश सज्जा

केश विनयास के बिना तो एक महिला का शृंगार अधूरा रहता है। इसमें वे बालों को सुगंधित तेल लगाकर संवारती है। बालों में सुगंधित धूप का धुआं भरती हैं। यह केशसज्जा का ही एक हिस्सा है।

आंखें

केश सज्जा के बाद आंखों का शृंगार किया जाता है। पलकों की बरौनियां संवारी जाती हैं। महिलाएं

अपनी आंखों को आकर्षक बनाने के लिए आंखों में सुरमा और घृत, कपूर व नीम पुष्प अंजन मिश्रण से बनाया गया काजल लगाती हैं।

सिंदूर भरना

लाल रंग का सिंदूर विवाहित महिलाएं अपनी मांग में भरती हैं। यह सिंदूर साधारण नहीं होता। वह विशेष प्रकार से बनाया गया लाल रंग का पाउडर होता है।

महावर

तीज-त्योहारों पर महिलाएं अपने हाथ में महावर लगाती हैं। इसमें लाख के तरल रस से आलता तैयार किया जाता है। इसे पांव का तलुवा, उंगलियां और अंगूठों को छोड़कर बचे हुए ऊपरी भाग पर आधा इंच चौड़ाई में रचाया जाता हे।

तिल बनाना

अपना सौंदर्य बढ़ाने के लिए महिलाएं शरीर के कुछ हिस्सों पर तिल बनाती हैं। इसमें ठोड़ी
के बीच में थोड़ा ऊपर काली बिन्दी या तिल बनाया जाता है।

मेंहदी

सोलह शृंगारों में एक है हाथों पर मेहंदी लगाना। महिलाएं हाथों, उंगलियों, हथेलियों और नखों पर मेहंदी रचाती हैं। इसमें मेहंदी से तोता और कमल के फूल, लहरिया, घेवर, तितली आदि डिजाइन बनाती हैं। इससे हाथ सुंदर और सुगंधित हो जाते हैं।

सुगंध

शुरू से ही शरीर को सुगंधित करना महिलाओं के शृंगार का एक अहम हिस्सा रहा है। पहले महिलाएं माथे पर केशर की आड़ी लकीर और कानों में इत्र का फाहा लगाती थीं। इससे दिन भर उनका शरीर महकता रहता था।

पुष्प सज्जा

शरीर को फूलों से बने आभूषणों से सजाया जाता है। गले, कलाइयों, केशों में फूलों से बने गजरे, वेणी, कानों में शिरीष, कर्णिकार लगाकर पुष्प सज्जा की जाती है।

आभूषण

यह शृंगार कर महिलाएं अपनी शोभा, समृद्धि तथा कलात्मक अभिरूचि का प्रदर्शन करती हैं। इसमें सिर से लेकर पांव तक सोना, चांदी और कांसे से बने आभूषण पहने जाते हैं।

होंठ  रचना

होंठों को खूबसूरत बनाने के लिए इसमें होंठों के लाली वाली रेखा तक के स्थान को रंगा जाता है। इसमें होंठ फटते नहीं हैं और सुंदर भी लगते हैं।

मिस्सी

मसूढ़ों को मजबूत बनाने के लिए महिलाएं मिस्सी लगाती हैं। इसमें वे दांतों के बीच की लकीरों और मसूड़ों को काला करती हैं। इससे उनके दांत सुंदर दिखते हैं।

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