यह एक विडंबना ही कही जावेगी कि स्वतंत्रता के पूर्व कहा जाता रहा कि देश के आजाद होने के बाद संपन्नता लौट आयेगी और गरीबी विलोपित हो जावेगी. 1947 से आज तक 65 वर्ष बीत गये- हम यह निश्चित नहीं कर पाये कि 122 करोड़ लोगों में कितने लोग गरीबी का दयनीय जीवन बिता रहे हैं.

हम मान बैठे हैं कि गरीब और गरीबी सापेक्षिक हैं. सारा चिंतन उलझन पूर्व है कि किसे गरीब कहा जाये? प्रोफेसर श्री विनास रथ और प्रो. व्ही.एम. दांडेकर ने गरीबी और रेखा की अवधारणा विकसित की- 2100 के लोरीज नगरी क्षेत्र में और 2400 केलोरीज ग्रामीण क्षेत्र में जो लोग खाकर जीवन बिताते हैं से नीचे खाने वाले गरीबी की रेखा से नीचे स्वीकार किये जायें अर्थात्ï गरीब स्वीकार किये जायें- ऐसी संस्था 1963-64 वर्ष में 52 प्रतिशत के आसपास थी. तब हम 46 करोड़ थे. इनमें लगभग 24 करोड़ गरीबी की रेखा के नीचे थे, तब 6-8 पैसा प्रति व्यक्ति प्रतिदिन व्यय करके जीवन यापन करने के लिये मजबूर थे.

वर्ष 2012 में गणना करें कि हम 122 करोड़ हैं. इनमें ग्रामीण क्षेत्र में 26 रुपया प्रतिदिन प्रति व्यक्ति तथा 32 रुपया प्रतिदिन प्रति व्यक्ति व्यय करके जीवन बिताने वाले 38 प्रतिशत लोग प्रो. एस. डी. तेंदूलकर गरीबी की रेखा के नीचे बैठते हैं- ये ग्रामीण क्षेत्र में 41 प्र.श. और 25 प्र.श. नगरी क्षेत्र में रह रहे हैं. कुल लगभग 43 करोड़ लोग गरीबी से भी नीचे वाला जीवन बिता रहे हैं. इन आंकड़ों की जादूगिरी से लगता है कि हम दो पग चले और तीन पग पीछे हटे हैं. अगर न चले होते अर्थात आर्थिक विकास नहीं हुआ होता तो संख्या में गरीबी की रेखा से नीचे वाले 60-63 करोड़ लोग होते, बडï भयंकर आर्थिक दृश्य होता, विकास की गति धीमी रही.

अंतरराष्टï्रीय मान 1.25 डालर प्रति व्यक्ति आय से 41.6 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे और 2.25 डालर के हिसाब से 75.8 प्रतिशत लोग 2008 वर्ष में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन के लिये मजबूर थे. यह क्रमश: 60 रुपया प्रतिदिन 125 रुपया प्रतिदिन बैठता है. चीन में इसी मान से 15 प्रतिशत तथा 39 प्रतिशत 1.25 डालर तथा 2.25 डालर आय से प्रति व्यक्ति अर्जित आय के मान से गणना में आता है. हम से चीन की स्थिति दो गुनी अच्छी दिखाई देती है. पाकिस्तान में 38 प्रतिशत, इंडोनेशिया में 21 प्रतिशत, बंगला देश में 49 प्रतिशत लोग 1.25 डालर प्रति व्यक्ति आय पर जीवन यापन करने के लिये मजबूर हैं. वहीं विकसित देश अमरीका व ब्रिटेन में 2.25 डालर पर गरीबी की रेखा से नीचे कोई नहीं और अरब देशों मेें भी कोई नहीं- उन्हें गरीबी की रेखा बनाने की आवश्यकता ही नहीं.

हमारे देश के अंदर राज्यों में विचारणीय या चिंतनीय असमानता है. 965 रुपया प्रतिमास व्यय करके राष्टï्रीय स्तर पर गरीबी रेखा के नीचे 32 रुपया प्रतिदिन नगरी क्षेत्र में और 781 रुपया व्यय करके 26 रुपया प्रतिदिन व्यय वाले ग्रामीण क्षेत्र में रेखा से नीचे समय काट रहे हैं. ये लोग क्रमश: 26 प्रतिशत और 41 प्रतिशत संख्या में है. समग्र रूप से 37 प्रतिशत लोग गणना में लिये जाते हैं. वर्ष 2011-12 के आर्थिक सर्वे के अनुसार ब्रेकेट में कतिपय राज्यों का प्रतिशत लिया जा रहा है-

आसाम (34.4 प्रतिशत), बिहार (54.4 प्रतिशत), छत्तीसगढ़ (49.4 प्रतिशत), गुजरात (31.8 प्रतिशत), हरियाणा (24.1 प्रतिशत), केरल (18.4), म.प्र. (48.6), पंजाब (20.9 प्रतिशत), राजस्थान (34 प्रतिशत), उड़ीसा (57.2 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश (40.9 प्रतिशत) और समग्र भारत (37.2 प्रतिशत).

आय की असमानता से असंतोष बना हुआ है. संगठित क्षेत्र में राज्यकीय उद्योगों में औसतन 96240 करोड़ रुपया वेतन 2010-11 वर्ष में बांटा गया, प्रति व्यक्ति यह 666276 रुपया गणना में आता है. लाभान्वित होने वाले 14.44 लाख लोग थे. निजी क्षेत्र में कोई हिसाब नहीं. न्यूनतम मजदूरी का प्रावधान अवश्य है, किंतु उच्चतम भुगतान उद्योग के स्वामित्व की इच्छा, उद्योग की दशा, व्यक्ति की योग्यता आदि पर निर्भर करता है. लघु उद्योग में संगठित उद्योग से विशंती (20 गुना) कम और असंगठित उद्योग की स्थिति अत्यंत दयनीय है. लगभग 90 प्रतिशत इनमें कार्यकारी, कृषि श्रमिक, मेकेनिक, घरेलू कार्यकारी को हम बिना किसी तर्क के गरीबी के नीचे रख सकते हैं. आयों की असमानता से कई विषमताओं को बल मिलता है. खाद्य पदार्थों में भेद, रहन-सहन में गहन अंतर, अशिक्षा (अज्ञानता का फैलाव), सबसे ऊपर कुशलता और उत्पादकता में अपेक्षा से कम उपलब्धि स्पष्ट दिखाई देती है. इसका परिणाम राजनैतिक और सामाजिक विकृतियों से हम देखते हैं.

गरीबी में आटा गीला कि बेरोजगारी उपलब्धियों को लीलती जा रही है. बेरोजगारी, महंगाई व बड़े परिवार गरीबी के सहायक तत्व हैं. बेरोजगारी दूर करने के राजकीय उपाय किये जा रहे हैं. ये उपाय अपर्याप्त और तदर्थ प्रकृति के हैं. एक तथ्य हमें कहने के लिये बाध्य कर रहा है कि गरीब लोग स्वभाव से संतोषी या आलसी जैसे होते हैं. नये-नये रोजगार खोजने की अज्ञानता के कारण अद्य- व्यवसायिता नहीं होती. दैनिक रोजगार की संयुक्त स्थिति जो सामान्यत: विद्यमान रहती है का 6.8 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र में और 5.8 प्रतिशत नगरी क्षेत्र में औसत बेरोजगारी वर्ष 2009-2010 में थी यह दैनिक कार्यरत श्रम शक्ति 400.8 मिलियन (दस लाख का एक मिलियन) का अंशानुपात गणना में आता है.

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