अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के प्रति युवाओं की बढ़ती दीवानगी की झलक उनके नवीनतम मॉडल के मोबाइल फोन या आईपोड से मिलती है जिन पर वे एमपी3 प्लेयर या फिर एफएम रेडियो के जरिये पसंदीदा संगीत का, कानों में ईयरफोन लगा कर आनंद लेते हैं. लेकिन ईयरफोन के लिए उनका यह लगाव उन्हें बहरा भी बना सकता है.-

डॉ गोविंद प्रभु कहते हैं कि जिम, बस स्टैंड, दुकान, पार्क जहां भी देखें, कानों में ईयरफोन पर संगीत सुनते युवा जरूर नजर आते हैं. लेकिन इन फोनों से कानों को संगीत अच्छी तरह नहीं सुनाई देता, क्योंकि ये पूरे कान को कवर नहीं करते. इसकी वजह से लोग इसकी आवाज तेज कर देते हैं और यही बात नुकसानदायक होती है.उन्होंने बताया कि लंबे समय तक तेज ध्वनि सुनने के कारण श्रवण क्षमता प्रभावित हो सकती है क्योंकि तेज ध्वनि ईयर ड्रम को क्षति पहुंचा कर उसे पतला कर देती है. ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. दीपचंद गुप्ता कहते हैं आम तौर पर लोगों के सुनने की क्षमता 50 साल की उम्र में प्रभावित होती है. लेकिन यह समस्या युवाओं में भी हो रही है और इसका कारण तेज वॉल्यूम में एमपी3 या आईपोड सुनना है.

डॉ. गुप्ता कहते हैं तेज ध्वनि के कारण, शुरू में कानों की रोम कोशिकाएं अस्थायी रूप से क्षतिग्रस्त होती हैं. या एक कान में सुनाई देना बंद हो जाता है. हम कह सकते हैं कि टाइनाइटस एक आम समस्या है, जिसमें रोम कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं. लेकिन ये अपनी मरम्मत भी कर लेती हैं अथवा इलाज से इन्हें ठीक किया जा सकता है।गुप्ता कहते हैं समस्या तब होती है जब ये कोशिकाएं ठीक नहीं हो पातीं और बहरापन स्थायी हो जाता है. सामान्य बातचीत के दौरान ध्वनि का औसत स्तर 60 डेसिबल होता है और हमारे कानों के लिए इतनी या इससे कम ध्वनि उपयुक्त होती है.

Related Posts: