शत्रुघ्न सिन्हा की सुपुत्री सोनाक्षी सिन्हा की अब तक प्रदर्शित दोनों फिल्में सफल रही हैं. सोनाक्षी ने आज के दौर में मीडिया द्वारा प्रचारित सुविधा-संपन्न, चमकीले महानगरों की कन्या का पात्र नहीं करके छोटे शहर या बड़े कस्बे की कन्या की भूमिकाएं अभिनीत की हैं. महानगरीय कन्या होने पर शरीर प्रदर्शन की छूट मिल जाती है और अभिनय की कम क्षमता को उघड़े बदन छिपाया जा सकता है, परंतु ग्रामीण कन्या होने के नाते सोनाक्षी ने दोनों फिल्मों में साडिय़ां पहनी हैं और पुन: साबित कर दिया कि साड़ी में सब कुछ छिपाया और बहुत कुछ दिखाया जा सकता है.

दरअसल साड़ी ऐब छिपाती है और आकर्षण को धार देती है. नाभिदर्शना साड़ी बांधने का ढंग उसे साड़ी रहने देकर भी स्कर्ट के झरोखे दे देता है. सोनाक्षी ने महानगरीय ढंग से साड़ी बांधी है. आज जिसे हम महानगरीय कहते हैं, दरअसल वह जनजातियों का पहनने का ढंग है. वहां मेहनतकश औरतें कुछ ऐसे ही साड़ी या साड़ीनुमा कपड़ा बांध लेती हैं. आज महानगरों में मॉल या किराने की दुकानों पर जौ या बाजरे का आटा या सारे अनाजों का मिश्रित आटा अमीरों के लिए खरीदते उनके नौकर देखे जा सकते हैं, गोयाकि वजन घटाने के लिए समृद्ध लोग गरीबों द्वारा खाया जाने वाला आटा खा रहे हैं. उन्हें विदित नहीं कि आटे से ज्यादा असर मेहनत करने का होता है. वॉटर बैड पर वातानुकूलित कमरे में जौ/बाजरा खाने से वह चर्बी नहीं घट सकती, जो दूसरों का हक मारकर जुटाई सुविधा से भरी जिंदगी के कारण बढ़ी है. जब कमर पर एक इंच चर्बी बढ़ती है, तब दिमाग पर शायद एक सेमी बढ़ती है, परंतु संवेदना तो इस भार के नीचे कुचल ही जाती है. बहरहाल, सोनाक्षी की सफलता का राज उनकी सादगी और उनकी आंखों में है. उन्होंने साबित कर दिया है कि सेक्सी दिखने के लिए जिस्म दिखाने से नहीं वरन् ढंकने से बात बनती है, बशर्ते आपकी आंखें बोलती हों.

सोनाक्षी की आंखों में निमंत्रण है, मुस्कान में दावत का वादा है. वह वर्तमान की होते हुए भी आपको पुराने जमाने की नायिकाओं की याद दिलाती हैं. उन्होंने मादकता को अपने ढंग से परिभाषित किया है. यह मादकता मर्यादा भंग नहीं करती, परंतु मन में इच्छाएं जगाती है. यह रसायन का अबूझ रहस्य है. अभी तक उनकी दोनों फिल्में ‘दबंग’ एवं ‘राउडी राठौरÓ नायकप्रधान एक्शन फिल्में हैं और नायिका के लिए अवसर कम हैं, परंतु उन सीमित अवसरों को उन्होंने अपने अभिनय से जमकर भुनाया है. वह एक्शन हीरो की ऊंची नाक के नीचे से दृश्य चुरा लेती हैं. कैमरे से उनकी यारी है. वह एक्शन फिल्मों के आयुर्वेद काढ़े पर अपने होम्योपैथिक डोज से बाजी मार लेती हैं. उनका लचीलापन उनकी सहायता करता है. प्राय: कलाकार कैमरे के सामने कुछ तनाव महसूस करते हैं, परंतु सोनाक्षी तनावमुक्त हैं. इसी रिश्ते को कैमरे से यारी कहते हैं. इन दोनों फिल्मों के नायक उनसे उम्र में बहुत बड़े हैं.

वह अपने हमउम्र रणबीर कपूर, इमरान खान जैसे नायकों के साथ कोई प्रेमकथा मिलते ही कयामत ढा सकती हैं. सलमान खान अपनी नायिकाओं से चुहलबाजी करते हैं, दर्शक को गुदगुदी हो ऐसा कुछ करते हैं, वह उनके साथ शरीर के स्तर पर निकटता नहीं आने देते. ये उनका अपना प्रेम का ढंग है. सोनाक्षी युवा नायकों के साथ इस नजदीकी में क्या प्रभाव पैदा करती हैं, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता. आज करीना कपूर और कैटरीना कैफ शिखर सितारा हैं तथा प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण उनके निकट ही खड़ी हैं. भविष्य में सोनाक्षी सिन्हा और अनुष्का शर्मा अत्यंत लोकप्रिय हो सकती हैं. अनुष्का को आदित्य चोपड़ा का मार्गदर्शन उपलब्ध है और वह यश चोपड़ा के निर्देशन में शाहरुख के साथ काम कर रही हैं. सोनाक्षी सिन्हा को ऐसे ही अवसर की तलाश है.

आज के पाश्चात्य ढंग से प्रस्तुत होने वाले नारी पात्रों के दौर में सोनाक्षी ने अपनी भारतीयता को अक्षुण्ण रखा है और यह भारतीयता राजनीति में नारे वाली नहीं होकर विशुद्ध गांवठी भारतीयता है. आजकल प्रकाश झा ‘मृत्युदंड’ जैसी फिल्में नहीं बनाते, अन्यथा उनके निर्देशन में सोनाक्षी कमाल कर सकती हैं. आज एमएफ हुसैन हमारे बीच नहीं हैं, वरना उन्हें माधुरी की तरह सोनाक्षी में भी मुकम्मल औरत नजर आती. आजकल लगभग सारी फिल्में पुरुषप्रधान हैं और अधिकांशत: पुरुष के नाम पर एक्शन प्रधान हैं. आज बिमल रॉय की तरह नारी के हृदय में शूट करने वाले फिल्मकार नहीं हैं, अत: ‘सुजाताÓ और ‘बंदिनी’ नामुमकिन है, परंतु ‘मधुमतिÓ मुमकिन है और ‘गंगा जमनाÓ की आंचलिक नायिका भी संभव है. सोनाक्षी इन्हीं रेशों से बुना मोटा तन ढांककर मन उजागर करने वाला कपड़ा हैं.

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