लोकपाल विधेयक पर अन्ना के अनशन से तो लोकपाल पर देश की सरकार, सभी पार्टियां व जनता जाग्रत हुई. जो विधेयक संसद में गत 40 वर्षों से लटक रहा था उसमें समय सीमा में ही गति लाई गई. लेकिन इस प्रश्न पर अन्ना की लगातार धमकी भरी भाषा और पार्टियां व संसद के प्रति हुक्म देने की शैली लोगों को रास नहीं आ रही थी. विधेयक को जब सरकार ने घोषित किया तो अन्ना ने उसे इस तरह नामंजूर कर दिया जैसे विधेयक पर उनकी ”मंजूरी” अनिवार्य है. इस रुख से कांग्रेस एवं यूपीए की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने अन्ना के रुख से क्षुब्ध होकर स्वयं मोर्चा संभाल लिया. उन्होंने भी आक्रामक भाषा में कह दिया कि अब इस मसले पर उनसेे संवाद नहीं होगा बल्कि उनके आंदोलन का मुकाबला किया जाएगा.

अन्ना ने भी अपनी प्रतिक्रिया में कह दिया कि अब जनता ही जवाब देगी और 30 दिसम्बर को सोनिया गांधी व राहुल गांधी के निवासों के सामने धरने से जेल भरो की बात कह दी. लोकसभा में विधेयक प्रस्तुत होने से पूर्व ही राष्ट्रीय जनता दल के श्री लालू यादव व समाजवादी पार्टी के श्री मुलायम सिंह यादव ने लोकपाल समिति में अल्पसंख्यक विशेषकर मुसलमानों को आरक्षण न होने पर ऐतराज उठाया. हंगामे से कार्यवाही स्थगित हुई और पुन: बैठक में भी सच्चर कमेटी के प्रतिवेदन पर अल्पसंख्यकों का मामला पुन: उठाया. अन्ना टीम का कहना है जिस लोकपाल को जांच करने का अधिकार ही न हो वह निरर्थक है. उनकी टीम का कहना है कि लालू यादव व मुलायम सिंह जिस तरह का विरोध कर रहे हैं वह कांग्रेस व सरकार द्वारा प्रायोजित है ताकि लोकपाल विधेयक को इस तरह के विरोधों से उत्तर प्रदेश व अन्य 4 राज्यों के विधानसभा चुनावों तक टाला जा सके. उत्तर प्रदेश के चुनावों में मुसलमान मतदाताओं को अपने अपने पक्ष में करने के प्रयास राजनैतिक दलों में चल ही रहे हैं. लालू यादव श्री अन्ना हजारे से इसलिये खार खाये बैठे हैं कि उन्होंने उनके प्रबल विरोधी बिहार के मुख्यमंत्री श्री नितेश कुमार को अच्छा मुख्यमंत्री कहा है.

लोकपाल पर इतने ज्यादा विचार व सुझाव आ रहे हैं कि इन विचारों की बाढ़ में लोकपाल का मसला बहता नजर आ रहा है. यह परिस्थितियां भी बनती नजर आ रही हैं कि इसे भी आम सहमति बनाने के नाम पर महिला आरक्षण विधेयक की तरह हमेशा लटकाया जाता रहेगा. अन्ना कांग्रेस के विरुद्ध राज्यों के विधानसभा के चुनावों में उतरने की घोषणा कर ही चुके हैं. उससे यह मुद्दा राजनैतिक महत्वाकांक्षा का रूप ले चुका है. अन्ना टीम ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं. वे केवल कांग्रेस व यूपीए में शामिल दलों के विरुद्ध प्रचार मात्र करेंगे कि उन्हें वोट न दिया जाए. यह अपने ढंग का पहला चुनाव प्रचार होगा जिसमें चुनाव से बाहर वाले लोग बिना किसी के लिए वोट मांगे कांग्रेस को वोट न देने का प्रचार करेंगे. इसमें अन्ना के प्रचार का क्या असर होगा. उनके नकारात्मक प्रचार से किस पार्टी को सकारात्मक लाभ होगा अब यह मुख्य मुद्दा हो गया कि भारत की राजनीति में अन्ना की हैसियत क्या है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

Related Posts: