मध्यप्रदेश में कुछ सुविधाएं और मिलें तो विकास के अवसर

इन्दौर, 16 अक्टूबर. म.प्र. के सोयाबीन प्लांटो ने सोया उत्पादों को लेकर देश-विदेश में पहचान बनाई है. हालांकि कुछ समस्याओं के कारण अन्य राज्यों के मुकाबले पिछड़े हुए हैं. म.प्र. में सोयाबीन का उत्पादन अमुमन 60 से 65 लाख टन होता है, लेकिन वर्षा के आधिक्य या कमी तथा इल्लियों के प्रकोप के कारण यह घटता बढ़ता रहता है. अच्छे बीज कीकमी व घटिया दर्जे के कीटनाशक व खाद के कारण बढ़ते रकबे के बावजूद सोयाबीन के उत्पादन का यह पैमाना कमोबेश वहीं का वहीं है.

प्लांटों की नहीं होती पूर्ति
म.प्र. में छोटे-बड़े कई साल्वेंट प्लांट हैं, जिन्हें अपनी क्षमता का आधा सोयाबीन भी मयस्सर नहीं हो पाता. कमजोर फसल व खराब क्वालिटी के चलते सोयाबीन उत्पादक भी घाटे में रहते हैं तथा अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाने के कारण साल्वेंट प्लांट भी. जैसा की सोया के प्रवक्ता राजेश अग्रवाल बताते हैं, इस स्थिति में ‘दो आषाढ़’ का काम सरकारी नीतियां करती हैं. यदि सरकार सोयाबीन उत्पादकों व प्रोसेसरों को सही मायने में सहयोग देकर आगे बढ़ाना चाहती है तो उसे सोयाबीन पर लगने वाले सिंगल पाइंट 5 प्रतिशत टैक्स व 2.2 प्रतिशत प्रवेश कर को समाप्त करना होगा या कम करना होगा.

म.प्र. के पड़ौसी राज्यों में इस इस तरह का टैक्स या तो है ही नहीं या फिर नगण्य है. यही कारण है कि देश के प्रमुख सोया उत्पादक प्रदेश का दर्जा रखने के बावजूद हमारे साल्वेंट प्लांट पड़ौसी राज्यों से मार खा रहे हैं. हालांकि सोया प्लांट मालिक केएल गुप्ता स्वीकारते हैं कि सोया व अन्य वाणिज्यिक संगठनों के दबाव में डीओसी पर लगने वाले टैक्स में पूर्ण रियायत दी है. उसके बाद अंतर्राष्टï्रीय मार्केट में निर्यात के हमारे अवसर उजले हुए हैं. सरकार इसी तरह से करों को युक्तियुक्तकरण कर दे व किसानों की खाद बीज की महती समस्याओं को हल करने पर ईमानदारी से ध्यान दें तो कोई कारण नहीं कि शिकागो अंतर्राष्टï्रीय बाजार में म.प्र. के सोया प्लांटो की डीओसी का दबदबा न हो.

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