ना सिर्फ मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश में उद्यानिकी (हार्टीकल्चर) अभी कृषि (एग्रीकल्चर) से बहुत पीछे है. कृषि तो यत्र तत्र सर्वत्र है. लेकिन फलों का उत्पादन कृषि की तरह संगठित व व्यापक नहीं है. बहुत सा फल उत्पादन उद्यानिकी और वानिकी (फारेस्ट्री) में बटा चलता है. हर गांव में कृषि उपजों के साथ फलदार वृक्षों को भी उद्यानिकी के आधार पर लगाया जाना चाहिए. अभी राज्य में बड़़वानी के पपीते और होशंगाबाद की बिही अपना नाम धाम रखती है. पचमढ़ी में आम के जंगल खड़े हैं.

डॉक्टर परसाई ने प्रत्यारोपण से कई वृक्षों को कलमी आम बना दिया है. लेकिन लखनऊ के मलिहाबादी आम की तर्ज पर अभी पचमढ़ी के आम ऐसा नाम आम के व्यापार में नहीं आया है. पचमढ़ी के आम उद्यानिकी के स्थान पर जंगल का उत्पादन माने जाते हैं. कड़कनाथ मुर्गा-मुर्गी की तरह झाबुआ-अलीराजपुर के आम भी बहुत ही खास किस्म के हैं और उनका स्थानीय नाम भी है. लेकिन उस अनोखी किस्म के आम का न तो वहीं पर और दूसरी जगह विस्तार किया है और न ही आम के बाजार में झाबुआ के विशिष्टï श्रेणी के आमों का नाम या जिक्र आता है. झाबुआ के आम अनोखे तो हैं लेकिन अभी भी गुमनामी में हैं.

इसी तरह मध्ययुगीय इतिहास के मुसलमानी शासनकाल में ईरान के खरामान इलाके की एक खास किस्म की इमली तत्कालीन अफगानी शासक हुशंगशाह ने मांडो में जंगल के रूप में लगाई. इसके झाड़ अभी भी मांडो क्षेत्र में मौजूद है. यह लौकी की तरह लंबी लेकिन उससे पतली होती है. स्थानीय लोग इसे मांडू की पर्यटन नगरी में सड़क किनारे बैठकर बेचते है. इस इमली में ‘क्यूब’ होते हैं. लेकिन इस नायाब चीज को अब तक मध्यप्रदेश की खासियत के रूप में फैलाया नहीं गया. कभी सांची के आसपास खिरनी के और भोपाल के पास मंडीदीप व मिसरोद में ‘सीताफल’ के जंगल खड़े थे.

आज इन इलाकों में खिरनी व सीताफल के विस्तृत क्षेत्र खत्म हो चुके हैं. यहां की मिट्टी इन फलों के लिये बहुत ही उपयुक्त है. लेकिन वहां मकानों के जंगल खड़े हो गये हैं. अगर मकानों के लिये ऐसे फलों का क्षेत्र मिटा दिया गया है तो अब इन मकानों का अधिग्रहण कर वहां फिर से खिरनी व सीताफल के जंगल लगा दिये जाए. मकान तो बंजर जमीन पर भी बन सकते हैं. लेकिन किसी खास उपज के लिये खास मिट्टी व जलवायु वरदान के रूप में किसी खास जगह ही होती है.

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