अभी मानसून चल ही रहा है और वर्षा भी हो रही है. बीच में कुछ अंतराल से खेती का कार्यक्रम जरूर पिछड़ गया है. लेकिन अभी सूखे की या खाद्यान्नों के अभाव की स्थिति नहीं बनी है. ऐसे में सरकार की तरफ से उपज में कमी या सूखे की संभावना के बयान स्थिति को बनाने के स्थान पर बिगाड़ते ज्यादा है.

पिछले 3-4 वर्षों में गेहूं, चावल, दालें, खाद्यान्न तेल, शक्कर के भावों में लगातार मूल्य वृद्धि इसलिये नहीं हुई कि इन वस्तुओं की उपज कम हुई और बाजार में सप्लाई का अभाव था. बाजार में सब वस्तुएं हर जगह भरपूर थी. लेकिन कृषि मंत्री श्री शरद पवार जो उन दिनों खाद्य मंत्री भी थे, के बयानों में लगातार यह कहते गये कि वस्तुओं का अभाव हो गया है और उससे ही भाव बढ़ते चले गये. जाहिर है उनका निहित स्वार्थ सट्टï व्यापारियों व शक्कर मिलों को अनुचित लाभ पहुंचाना था. श्री पवार यह सब अनुचित बयान नहीं देते तो उस समय और आज भी खाद्य वस्तुओं के भावों में अत्याधिक मूल्यवृद्धि नहीं होती.

अभी सरकार की तरफ से यह कहा जाना जनहित में नहीं है कि दालों व खाद्यान्न तेलों के उत्पादन में कमी आयेगी और भाव बढ़ सकते हैं. सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये सब्सिडी देकर इन्हें मुहैया करायेगी. अभी मानसूनी वर्षा दुबारा होने से दलहन व तिलहन फसलों की हालत सुधरी है. किसानों ने इस बार ज्यादा रकबा में बोवनी की है. किसी भी बयानबाजी से पहले हमें मानसून के जाने तक स्थिति का पूरा आंकलन करने के लिये इंतजार करना चाहिए. दक्षिण-पश्चिम मानसून सितम्बर के आखरी हफ्ते से वापस जाता हुआ पूरी तौर पर अक्टूबर के पहले पखवाड़े में वापस होता है और इसी के साथ दक्षिण राज्यों में प्रशांत महासागर से बंगाल की खाड़ी से होता हुआ शीतकालीन मानसून अक्टूबर में तमिलनाडु, आंध्र, कर्नाटक, केरल और ओडि़सा में अक्टूबर से जनवरी तक रहता है. भारत में कुल मिलाकर 8 महीने जून से जनवरी तक दो मानसून रहते हैं. इसमें अक्टूबर माह में ग्रीष्मकालीन मानसून जाता है और दूसरा शीतकालीन मानसून आता है. अक्टूबर को भारत का दो मानसून वाला महीना माना जाता है.

केन्द्रीय खाद्य मंत्री श्री के.वी. थामस ने अभी से दालों व खाद्य तेलों पर चिन्ता जता दी. इनके आयात व इन पर सार्वजनिक प्रणाली के जरिये सब्सिडी देने की बात भी कह डाली. जबकि यथार्थ यह है कि पिछले कई दशकों में भारत में खाद्य तेल और दालें हमारी जरूरत से कम रहती हैं और हम इनका आयात करते ही हैं. इसमें इस साल कुछ भी नया नहीं है बल्कि पिछले से दो सालों में यह जरूर हुआ है कि किसानों ने तिलहन व दहलनों की खेती में रकबा काफी बढ़ा दिया है और इनका उत्पादन काफी बढ़ा है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में लगातार हर साल मलेशिया से आयात किया पाम आइल ही दिया जाता है.  दालों का भी आयात लगातार होता आ रहा है.

देश में इस समय 1.7 करोड़ टन दालों का उत्पादन होता है और लगभग 40 से 50 लाख टन का आयात किया जाता है क्योंकि हमारी जरूरत लगभग 2.2 लाख टन है. खाद्य तेलों में जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत आयात होता है. हमारा खाद्यान्न तेलों का टोटा सबसे ज्यादा है. अब किसान तिलहन फसलों का रकबा भी बढ़ा चुके हैं. खाद्य तेलों की कमी को सोयबीन का उत्पादन व तेल काफी पूरा करता जा रहा है.देश इन दिनों हर फसल में बम्पर फसलों के दौर से चल रहा है. अनाज का विपुल भंडार है. मध्यप्रदेश तो गेहूं में न सिर्फ बम्पर फसलों बल्कि क्वालिटी में भी छलांगे लगा रहा है. पहले उत्तर प्रदेश, हरियाणा को भी पीछे छोड़कर दूसरे स्थान पर आ गया है. इरान की टीम ने मध्यप्रदेश के गेहूं की क्वालिटी को पंजाब, हरियाणा से भी बढिय़ा और भारत में सबसे अच्छा पाया. वह यहां से  ढाई लाख टन गेहूं खरीद रहा है, जो 15 लाख टन तक जा सकता है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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