जो जंगल में रहे वह जंगली आदमी या जंगली जानवर, जो शहरों में रहे वह सभ्य आदमी या पालतू जानवर. पता नहीं क्यों शब्द ‘जंगली’ को गाली या अपमान सूचक की तरह प्रयोग किया जाता है. जंगली शेर ही शेर होता है- सर्कस का शेर तो अब वहां से छुड़ाकर वापस जंगलों में पुनर्वासित किया जा रहा है.

इन दोनों के बीच एक आवारा आदमी व आवारा जानवर भी आ गया है. ये दोनों ही समाज का सरदर्द बने हुये हैं. आवारा प्रवृति का आदमी अपराधी ही बनता है और आवारा जानवर भी लोगों को त्रास देते जा रहे हैं. ये दोनों शहरों या गांवों में आबादी में रहते हैं. जंगल का जानवर या आदमी आवारा होता ही नहीं है. गाली के रूप में जंगली का यही अर्थ होता है कि वह आधुनिक सभ्यता व रहन सहन से दूर है.

गांवों तक सड़क व बिजली यातायात पहुंचने से वह भी ‘जंगली’ नहीं कहलायेगा. यदि जंगल कट गये तब भी कोई जंगली नहीं रहेगा. इसीलिये जंगल का शेर भोपाल शहर के आसपास अपनी ‘टेरीटरी’ बनाता घूम रहा है. मुंबई जैसे महानगर में भी एक शेर जुहू में हेमामालिनी के बंगले में जाकर लान में बैठ गया था. लेकिन इन आवारा जानवरों व आवारा लोगों का इलाज करना इस समय शहरों व गांवों की बहुत बड़ी जरूरत है जिस पर तात्कालिक कार्यवाही होनी चाहिये. शहरों में चारागाह तो होते नहीं हैं इसलिये पालतू जानवर सड़कों पर छोड़ दिये जाते हैं.

सुअर और कुत्तों से अनेकों सड़क दुर्घटनायें होती जा रही हैं और कई लोग मर गये. कुत्ते काटने से जानलेवा बीमारी हाइड्रोफोबिया मौत बना हुआ है. रोज सैंकड़ों लोगों को कुत्ते काट रहे हैं. शहरों के बढ़ïते यातायात में कुत्ते ‘स्पीड ब्रेकर’ बने हुये हैं. आवारा जानवरों व लोगों की वजह से लोग घरों में बगीचा या फलदार झाड़ नहीं लगाते हैं. आवारा जानवर व लड़के उन्हें बरबाद कर ही देते हैं. कोई भी बाहर बैठकर उनकी निगरानी नहीं कर सकता. नगरीय संस्थानों का कांजी हाउस की व्यवस्था अपने आप में सबसे बेतुकी है.

किसी आवारा जानवर को पकडऩा ही दूभर काम है और फिर उसे कांजी हाउस तक ले जाने से ज्यादा अच्छा यह हो वह आदमी खुद ही जाकर कांजी हाऊस में बैठ जाये. गांवों में भी लोग कई-कई अनुपयोगी जानवरों को घर से हटा देते हैं और ये आवारा गाय खेती को बहुत नुकसान पहुंचाती हैं.सरकार को अलग से शासन व प्रशासन की व्यवस्था इस ‘आवारा’ त्रासदी को खत्म करने के लिये बनाना चाहिये. मंत्रिमंडल में एक आवारा मंत्री व प्रशासन में एक आवारा डायरेक्टर होना ही चाहिये.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

Related Posts: