लोकसभा चुनाव 2014 में होने हैं. राजनैतिक अनुमान यह भी हो रहे हैं कि ये समय पूर्व भी हो सकते हैं. सभी दल उसकी तैयारियों में जुट गए हैं. नए-नए भ्रष्टïाचार के राजनैतिक मुद्दे रोज सामने आ रहे हैं. इन सब तैयारियों में सबसे बड़ी तैयारी चुनाव के लिए करोड़ों-अरबों रुपयों का फंड जुटाने की होती है. उसकी तैयारियां भी हो रही हैं और वातावरण बनाना शुरू हो गया है. चुनाव फंड में सबसे ज्यादा फंड शक्कर मिलों से आता है.

निश्चित ही जानिए कि आने वाले दिनों में शक्कर के भाव जो अभी 40 रुपये किलो के आसपास चल रहे हैं उनमें भावों की आग लगने वाली है. प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार श्री रंगराजन कमेटी ने सरकार से कहा है कि शक्कर को सरकार के नियंत्रण से बिल्कुल मुक्त कर दिया जाए. शक्कर मिलें खुले बाजार में मांग व आपूर्ति के आधार पर शक्कर बेचें. इन मिलों पर आयात-निर्यात का सरकारी नियंत्रण भी खत्म कर दिया जाए. वे जब चाहें आयात या निर्यात करें. गत लोकसभा चुनावों से पहले भी शक्कर जो 12-13 रुपये किलो बिक रही थी, एकाएक 30-35 प्रति किलो हो गयी थी, तभी से शक्कर अब बढ़कर 40 रुपये प्रति किलो के आसपास चल रही है.

ऐसा पहले भी एक बार चौधरी चरण सिंह की अल्पमत और पराजित सरकार ने 1979-80 में किया था. श्री मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार गिरा कर कांग्रेस के समर्थन में अल्पमत सरकार बनाई थी. इसे कुछ ही महीनों में कांग्रेस ने समर्थन वापस लेकर गिरा दिया था. उस समय इस कार्यवाहक सरकार का न तो दल के रूप में कोई वजूद था और न ही चौधरी चरण सिंह के पुन: सत्ता में आने की कोई उम्मीद थी. मध्यावधि आम चुनाव होने ही थे. उन्होंने खासकर उत्तर प्रदेश की शक्कर मिलों व देश की अन्य शक्कर मिलों में फंड के लिए सौदेबाजी की. शक्कर पर से सरकार की लेवी शक्कर के लिये दोहरी मूल्य नीति (डुएल प्राइस सिस्टम) खत्म कर दिया. इसमें एक दिन में ही जो शक्कर 2-3 रुपये प्रति किलो बिक रही थी वह 12-13 रुपये किलो हो गई. इसमें चौधरी की पार्टी को भी फन्ड हासिल हुआ होगा.

अब फिर वही माहौल श्री मनमोहन सिंह की सरकार बना रही है. अभी शक्कर मिलें सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए अपने उत्पादन का 10 प्रतिशत भाग देने को कानूनी रूप से बाध्य है. रंगराजन कमेटी की सिफारिश के अनुसार इसके 10 प्रतिशत कोटे को खत्म किया जा सकता है और शक्कर का निर्यात भी नियंत्रण मुक्त कर दिया जायेगा. इस पर शक्कर मिलें निश्चित तौर पर भारी मात्रा में शक्कर का निर्यात कर मुनाफा कमायेंगी. इस निर्यात से देश में शक्कर की आपूर्ति कम हो जायेगी. लिहाजा देश के अन्दर भी शक्कर के भाव बढ़ेंगे. इस तरह चुनाव ‘फन्ड’ जरूरत के लिये शक्कर मिलें निर्यात से देश के बाहर से और देश के अन्दर शक्कर की कमी पैदा कर भाव बढ़ाकर ‘बाहर-अन्दरÓ दोनों तरफ से भारी मुनाफा कमाने जा रही हैं. यह भी हो सकता है चुनावों से पहले ही फंडबाजी के चक्कर में शक्कर के भाव 100 प्रति किलो तक पहुंच जाये.

वित्त मंत्री श्री चिदम्बरम् ने भी इस तैयारी में अपना योगदान यह कहकर दिया है कि देश में अस्थाई तौर पर वस्तुओं की कीमत बढ़ सकती है. इसके लिये उन्होंने यह सुहाना या घिनौना तर्क दिया है कि अभी आर्थिक सुधार करने हैं इसके लिये देश में पूंजी बाजार बढ़ाया जाएगा, जिससे निवेश बढ़ाया जा सके. सरकार जब भी आर्थिक सुधार की बात करती है तो उसका एक ही अर्थ होता है कि आम आदमी की आम जरूरत की चीजों गेहूं, चावल, दाल, आटा, नमक, खाद्य तेल, पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के भाव बढ़ा दिए जायें. आगामी चुनावों की आपाधापी में आर्थिक सुधार के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है उससे आम जनता का आर्थिक आधार ही ध्वस्त हो रहा है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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