नई दिल्ली, 20 मार्च. सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकों के साथ भेदभाव के अहम मुद्दे पर ढीले रुख को अपनाने को लेकर आज केंद्र की खिंचाई की और कहा कि इसकी निंदा की जानी चाहिए.

न्यायाधीश जी एस सिंघवी और एस जे मुखोपाध्याय की बेंच ने सरकार के विभिन्न हलफनामों पर विचार करने के बाद कहा कि केंद्र ने मामले को हल्के में लिया है. बेंच ने कहा, उन्होंने मामले को हल्के में लिया है. इस प्रकार के व्यवहार की निंदा किए जाने की जरूरत है और हम इस बारे में अपने फैसले में उल्लेख करने जा रहे हैं. न्यायालय ने कहा कि यह खास मामला है जिसमें सरकार ने उच्च न्यायालय में मामला लडऩे के बाद न्यायालय के समक्ष उदासीन रुख अपनाया है.  हमें नहीं पता कि वे कितने मामले में उदासीन हैं.

यह खास मामला है जहां केंद्र उच्च न्यायालय में बहस के बाद अब उदासीन रुख अपना रहा है. बेंच ने कहा, सरकार मामले में तटस्थ रुख के साथ आई है. किसे स्वीकार किया जाना चाहिए, उच्च न्यायालय में जो हलफनामा दायर किया गया था या शीर्ष अदालत में उदासीन रूख का. बेंच ने इस बात पर चिंता जताई कि विधि आयोग की सिफारिश के बावजूद पिछले 60 साल में संसद ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 में संशोधन पर विचार नहीं किया है. न्यायालय ने कहा, विधायिका के पास इन मुद्दों पर विचार के लिए समय नहीं है. आखिर इस देश के लोग कब तक इंतजार करेंगे….

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