खाद्यान्नों के भाव बढऩे से सभी वस्तुओं के भाव बढऩे का सिलसिला चल पड़ता है. अब यह विचार बन रहा है कि भावों को कहीं स्थिर करना चाहिए. जो हमारे उत्पाद हैं उन पर तो नियंत्रण हो सकता है लेकिन पेट्रो पदार्थ- दूसरों के उत्पाद और हमारा आयात है. अब ये समाज की आर्थिक गतिविधियों का अंग बन चुके हैं. इसलिए भावों में स्थिरता लाना विचार मात्र बन के रह जाता है. महंगाई-मंदी अब किसी एक राष्ट्र तक सीमित नहीं है. सभी इससे पीडि़त हैं.

अगर अरब राष्ट्रों के पास पेट्रो वस्तुओं का लगभग एकाधिकार है तो उन्हें भी अपनी अन्य जरूरतों- जिनमें खाद्यान्न भी शामिल है, दूसरों पर आश्रित होना पड़ता है. कुछ समय पूर्व भारत ने बासमती चावल के निर्यात पर रोक लगाई थी. उससे अरब राष्टï्रों में खाद्यान्न का संकट उत्पन्न हो गया था. विश्व स्तर पर यदि पेट्रो पदार्थों पर कोई ऐसा निर्णय हो सके कि इनके मूल्य स्थिर किये जा सके तो विश्व के अन्य राष्ट्रों में मूल्यों के नियंत्रण से आर्थिक स्थिरता आ सकती है. भारत में एक अरसे से रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों को बढ़ाकर मूल्य नियंत्रण की कोशिशें की जा रही हैं. इसी दिवाली पर 13वीं ब्याज दरें बढ़ाई गई. लेकिन इस कवायद से कुछ हुआ नहीं. रिजर्व बैंक ने यह संकेत दिया है कि अब दरों में और वृद्धि की संभावना नहीं है और यह सिलसिला थम सकता है. शासन स्तर पर भी रिजर्व बैंक की ब्याज दरों में वृद्धि पर लगाम कसने की संभावना है.

किसानों के हित में यह कदम उठाया गया कि रबी फसलों के समर्थन मूल्यों में वृद्धि की जाए. खेती में लगने वाले बीज, खाद, कीटनाशक, कृषि मशीनें व छोटे यंत्रों के मूल्यों में काफी वृद्धि हो जाने से कृषि की लागत में भी इजाफा हो गया है. डीजल के भाव भी बढ़ाए गए हैं. इसलिए समर्थन मूल्यों को केंद्र सरकार ने बढ़ाया है. गेहूं का समर्थन मूल्य 14 प्रतिशत 115 रुपये बढ़ाकर प्रति क्विंटल 1285 रुपये कर दिया गया है. चना और सरसों में 33 व 38 प्रतिशत की वृद्धि की गई है. इससे चना 2100 रुपये प्रति क्विंटल और सरसों 1800 रुपये से बढ़कर 2500 रुपये प्रति क्विंटल की गई है. मसूर में 550 रुपये की वृद्धि करके 2800 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है. कृषि लागत एवं मूल्य आयोग ने गेहूं के समर्थन मूल्य में लागत के हिसाब से 230 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाने की अनुशंसा की थी.

लेकिन खाद्य एवं वित्त मंत्रालय इस पर सहमत नहीं थे इसलिए इसे मात्र 115 रुपये ही बढ़ाये हैं. केंद्र सरकार ने खाद्य वस्तुओं की बढ़ती महंगाई और खेती की बढ़ती लागत को ध्यान में रखकर संतुलन बनाने की कोशिश की है. विश्व स्तर पर मूल्य, महंगाई और मंदी पर सरकारों के बीच और संयुक्त राष्ट्र संघ के अलावा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में गंभीर विचार विमर्श हो रहा है. आर्थिक अस्थिरता में यूरो जोन के कई यूरोपीय देशों का बजट फेल हो गया. ऋण संकट पैदा हो गया. इसका असर भी अन्य सभी देशों पर पड़ रहा है.

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प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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