पूर्व केंद्रीय वित्त एवं वर्तमान गृह मंत्री श्री चिदम्बरम ने कहा है कि अमीर वर्ग पर ज्यादा कर लगना चाहिए. यह एक सामान्य सिद्धांत है और इसमें नया कुछ नहीं है. आयकर उन्हीं पर लगता है जिनकी एक सीमा से ऊपर आय होती है. वस्तुओं पर भी सामान्य से लेकर लग्झरी व विंडफाल टैक्स भी लगते हैं सरकारें भी यही करती हैं कि वर्ग विशेष और वस्तु विशेष के आधारों पर कर लगाया जाता है.

इस समय करों की अर्थव्यवस्था में यदि कुछ विशेष है या कमी है तो वह यही है कि आम जनता से करों के जरिए जो आय होती है उसका अधिकांश भाग अधिकारी व कर्मचारी वर्ग द्वारा गबन या भ्रष्टïाचार में चला जाता है. विकास पर ऐसा अनुमान है कि इन मदों पर 40 प्रतिशत रुपया लगाया जाता है. शेष 60 प्रतिशत स्तरहीन कार्य व भ्रष्टाचार में चला जाता है. करों की पूरी वसूली नहीं होती और करों की चोरी भी एक बड़ा संगठित धंधा है. विदेशों में काला धन जितना अनुमानित किया गया है वह सब टैक्स की चोरी का है. सभी का यह मानना है कि यदि विदेशों में जमा काले धन की पूरी वसूली हो जाए तो अगले 20 साल तक देश में कोई टैक्स लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. छोटे-छोटे अधिकारियों व बाबुओं के घर से करोड़ों रुपया व करोड़ों की सम्पत्ति मिल रही है.

यह जाहिर हो रहा है कि भ्रष्टाचार करके उनका स्वयं का विकास किया है और उसकी कीमत देश के विकास को चुकानी पड़ी. स्प्रेक्ट्रम घपले के बारे में यह प्रगट हो रहा है कि उसमें जितनी आय सरकार को होती थी उससे कहीं ज्यादा रिश्वतखोर मंत्री व अधिकारी ले जा चुके हैं. किसी भी तर्क से करों को बढ़ाना आम आदमी को और उसके रुपयों को बरबाद करना है. जितना रुपया भ्रष्टाचार में बरबाद कर दिया गया यदि उसका पूरा व सही इस्तेमाल होता तो देश के साथ आम आदमी का भी और अधिक आर्थिक विकास हो गया होता. उसकी अधिक खर्च करने की और अधिक टैक्स देने की क्षमता भी बढ़ गई होती.

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सरकारी सबसिडी से अनाज, घासलेट सस्ती दर पर देकर न तो लोगों की आर्थिक उन्नति होती है और न ही इसे विकास की कार्यवाही कहा जा सकता. लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर लाने के लिए उसकी आर्थिक स्थिति को इतनी उन्नत करना होगा कि वह अपनी रोटी, कपड़ा व मकान की स्वयं व्यवस्था कर सके. इन दिनों एक मुहिम और माहौल भ्रष्टाचार के विरुद्ध बना है.

इसकी सार्थकता इसी में नापी-जांची जायेगी कि इससे भ्रष्टïचार कितना कम या खत्म हो गया. अन्यथा संसदीय प्रजातंत्र में राजनैतिक नजरिये से आंदोलन चला ही करते हैं. प्रजातंत्र में सरकार और जनता को अलग-अलग करके नहीं देखा या आंका जा सकता हो- कि सरकार भ्रष्ट है और जनता ईमानदार है. अभी जब भ्रष्टाचार है तो वह जनता से लेकर सरकार तक सर्वांगीण है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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