• चुनावी वैतरणी पार करने हो रही मशक्कत

नई दिल्ली, ०4 अक्टूबर. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी के संदर्भ में लगभग सभी दलों की ओर से भले ही अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं. लेकिन सच्चाई यही है कि लगभग सभी दलों के रणनीतिकार दलबदलुओं के कंधे के सहारे ही चुनावी वैतरणी पार करने का सपना देख रहे हैं.

उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम के सहारे दिल्ली के तख्त का रास्ता तलाशने में जुटे राजनीतिक दलों की ओर से भले ही चुनावी शंखनाद हो चुका है लेकिन अभी तक किसी भी दल ने न तो उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप दिया है और न ही कोई ठोस रणनीति का खुलासा किया है. अलबत्ता सपा, कांग्रेस व भाजपा के साथ-साथ सत्ताधारी बसपा भी उम्मीदवारों के चयन में उम्मीद के विपरीत परिवारवाद के आगोश में फंस चुकी है. इसी वजह से सबसे पहले उम्मीदवारों के नामों की घोषणा करने का दावा करने वाली बसपा इस बार अंतरकलह की शिकार हो गई है. राजनीतिक प्रेक्षकों की माने तो इस चुनाव में कांगे्रस पार्टी ने अपनी परंपरा में बदलाव करते हुए लगभग छ: माह पहले ही उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया आरंभ कर दी गई है.

लेकिन तमाम प्रयास के बाद भी पार्टी विधानसभा के आधे सीट के लिए भी उम्मीदवारों की घोषणा अबतक नहीं कर सकी है. यहीं हाल भाजपाई खेमा में भी देखा जा रहा है. पार्टी के पास कहने को तो दिग्गज नेताओं की भरमार है लेकिन जमीनी मुकाबला करने वालों की कमी चयनकार्ताओं के सामने एक चुनौती बनी हुई है. प्रेक्षक मान रहे हैं कि राजनीति में आया राम- गया राम कहे जाने वाले दलबदलुओं की पूछ सबसे ज्यादा भाजपा में ही होने वाली है. क्योंकि भाजपा के पास कैडर तो हैं लेकिन उम्मीदवारों का टोटा है. विश्लेषकों की माने तो  भाजपा के बाद दलबदलुओं के लिए बेहतर रैन बसेरा कांगे्रस है. क्योंकि कांगे्रसी रणनीतिकार अपने कैडरों पर दाव लगाने से हिचक रहे हैं और वे दूसरे दल से कांगे्रस में आए कथित जिताऊ उम्मीदवारों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं. यानी कांगे्रस महासचिव राहुल गांधी के तमाम प्रयास के बाद भी पार्टी अत्मनिर्भर होने को तैयार नहीं है. प्रेक्षकों की माने तो बसपा, सपा व इनेलो के लिए दलबदलुओं का आना जाना कोई खबर नहीं है. क्योंकि इनका आधार ही इसी पर निर्भर रहा है. इसलिए इस बार भी यह कहा जा सकता है कि चुनावी वैतरणी पार करने के लिए राजनीतिक दल अपने कैडरों से ज्यादा दलबदलुओं पर ही निर्भर रहेंगे.

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