इस साल अनाज की सबसे अधिक खरीद हुई है। खाद्य मंत्रालय के अनुसार केंद्रीय भंडार में अब तक 823.17 लाख मीट्रिक टन अनाज पहुंचा है। केंद्रीय खाद्य मंत्री केवी थॉमस ने एक संवाददाता सम्मेलन में बताया कि भंडारों में अतिरिक्त क्षमता का निर्माण और खराब हो रहे अनाज को हटाने की योजना के साथ-साथ दैनिक आधार पर अनाज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के उपाय किए जा रहे हैं।

नई दिल्ली. केंद्रीय खाद्य मंत्री केवी थॉमस ने एक संवाददाता सम्मेलन में बताया कि भंडारों में अतिरिक्त क्षमता का निर्माण और खराब हो रहे अनाज को हटाने की योजना के साथ-साथ दैनिक आधार पर अनाज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के उपाय किए जा रहे हैं।   अनाज के रिकार्ड उत्पादन और न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी के साथ अनाज की खरीद के लिए किए गए बेहतर उपायों से इस वर्ष अनाज की सबसे अधिक खरीद हुई है। एक जून को केंद्रीय अनाज भंडार में 823.17 लाख मीट्रिक टन का भंडार था, जिसमें 501.69 लाख मीट्रिक टन गेहूं और 321.48 लाख मीट्रिक टन चावल था।

भंडारण का रखा जाएगा ख्याल
थॉमस ने कहा कि केंद्रीय भंडार के लिए खरीदे गए अनाज का भंडारण भारतीय खाद्य निगम और राज्य सरकार तथा इनकी एजेंसियों द्वारा किया जाता है। पिछले पांच वर्षो में भारतीय खाद्य निगम की भंडारण क्षमता 31 मार्च, 2008 को 238.94 लाख मीट्रिक टन थी, जो लगभग 40 प्रतिशत बढ़कर 31 मार्च, 2012 को 336.04 लाख मीट्रिक टन हो गई।
भारतीय खाद्य निगम और राज्य सरकार तथा इनकी एजेंसियां अनाज का भंडारण ढके हुए स्थान पर करती है और अनाज रखने के लिए प्लेटफार्म (चौकी) बनाई जाती है। इसके लिए कैप और कच्चा कैप भंडारण का तरीका अपनाया जाता है। एक जून को 273.96 लाख मीट्रिक टन गेहूं का खुले में भंडारण किया गया था।

कच्चे स्थानों पर रखे जाते हैं 13 फीसदी गेहूं
केंद्रीय भंडार के गेहूं के कुल भंडार में से 87 प्रतिशत ढके हुए और कैप स्टोरेज में किया जाता है और इसे सुरक्षित भंडारण माना जाता है। बाकी का 13 प्रतिशत गेहूं कच्चे स्थानों पर किया जाता है, जिससे नुकसान का खतरा बना रहता है। कच्चे स्टोरेज में रखे गए अनाज में से 65.66 लाख मीट्रिक टन अनाज का भंडारण पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में है।

तुवर वायदा के लिए लॉबिंग –  कृषि जिंसों की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव और वायदा कारोबार में गड़बड़ी की आशंका के चलते चने के वायदा कारोबार पर तलवार लटकती दिखाई दे रही है। कारोबारियों का मानना है कि मौजूदा माहौल में दलहन की कीमतों में और तेजी  आना तय है। दलहन कारोबारी अरहर और मूंग का वायदा कारोबार शुरू करने की मंजूरी देने को लेकर सरकार पर दबाव बना रहे हैं। दलहन कारोबारियों के प्रमुख संगठनों का मानना है कि महंगाई के लिए वायदा कारोबार नहीं बल्कि सरकार की गलत नीतियां और कम उत्पादन जिम्मेदार है।दलहन कारोबारियों को उम्मीद थी कि  सरकार अरहर वायदा शुरू करने को मंजूरी देगी।

अरहर (तुअर) सहित दूसरी दलहनों का वायदा कारोबार तो बंद है ही साथ ही एकमात्र दलहल (चना), जिसका वायदा कारोबार हो रहा है, उस पर भी रोक की तलवार लटकी हुई है। इंडिया पल्सेज ऐंड ग्रेन एसोसिएशन (आईपीजीए) के अध्यक्ष प्रवीण डोंगरे कहते हैं यह सच है कि इस समय चना वायदा कारोबार पर भी रोक की तलवार लटक रही है लेकिन इसके बावजूद हम अपनी कोशिशें जारी रखे हुए हैं। इसके पहले सरकार ने वादा किया था कि मार्च के अंत तक तुअर वायदा शुरू कर दिया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हो सका है। वह कहते हैं अभिजीत सेन रिपोर्ट में भी यह साफ तौर पर कहा गया है कि महंगाई के लिए वायदा कारोबार जिम्मेदार नहीं है। फिर दलहन के वायदा कारोबार पर रोक क्यों है?

दालों की कीमतों में बेतहासा वृद्धि की वजह से 23 जनवरी 2007 को सरकार ने तुअर और उड़द के वायदा कारोबार पर रोक लगा दी थी। वायदा कारोबार में रोक के बावजूद पिछले साल तुअर दाल की कीमत खुदरा बाजार में 100 रुपये प्रति किलोग्राम को पार कर गई थी। दलहन कारोबारी इस बात से सहमत नजर आते हैं कि कुछ जिंसों में सटोरिए गड़बड़ी फैला

Related Posts: