गवान गौतम बुद्ध का जन्म ईसा से 563 साल पूर्व और महापरिनिर्वाण 483 ईसा पूर्व हुआ था. ज्ञान की प्राप्ति 528 ईसा पूर्व हुई थी. जन्म, ज्ञान की प्राप्ति एवं परिनिर्वाण तीनों बैशाखी पूर्णिमा के दिन ही हुए थे. इनका नाम सिद्धार्थ गौतम हुआ करता था.

इन्हें ऐश एवं आराम की कोई कमी नहीं थी क्योंकि ये एक राजघराने में पैदा हुए थे. बचपन से ही ये शांत स्वभाव के थे. बहुत कुछ सांसारिक वस्तुओं की उपलब्धता के बावजूद ये प्रभावित नहीं हुए. संसार में दुख है, ये बात उन्हें बार-बार बेचैन करती थी. इनका विवाह यशोधरा से हुआ था और इनसे एक पुत्र की भी प्राप्ति हुई. बचपन से ही राजकाज में इनकी कोई रुचि नहीं थी. घरवालों को जैसे-जैसे पता लगा वैसे-वैसे वे ज्यादा से ज्यादा शान-शौकत की वस्तुएं सुलभ कराते रहे परंतु वे इस मायाजाल में न फंसे और मानव सेवा के लिए गृहस्थ जीवन को त्याग दिया.

प्रचलन के अनुसार मानव सेवा या अध्यात्म की प्राप्ति एकांतवास में संन्यास करके संभव माना जाता था. इसलिए इन्होंने भी अन्य पांच सहयोगियों के साथ लगभग छ: साल जंगल में घोर तपस्या की. इतनी घोर तपस्या की कि शरीर जीर्ण हो गया और चलने-फिरने की भी शक्ति नहीं रही. धीरे-धीरे इन्होंने एहसास किया कि इस तरह से मानव सेवा संभव नहीं है. ऐसी तपस्या से यदि इंसान अपनी इंद्रियों के ऊपर नियंत्रण भी कर ले तो उससे समाज को क्या लाभ होगा? वैसे एकांत में ध्यानमग्न होकर कुछ बातों को जाना-समझा जा सकता है लेकिन इससे परजीवी होने का भी संदेश जाता है. चाहे जंगल में कोई ध्यान लगाये या अन्यत्र , जीवन की आवश्यक वस्तुएं जैसे- खाद्य पदार्थ, कपड़े आदि की आवश्यकता पड़ती ही है. इसे कोई ना कोई पैदा करता ही है. पैदा करने वाले सोचेंगे कि गृहस्थ जीवन निरर्थक है और वानप्रस्थ उत्तम, जिसका समाज पर प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ा और इस तरह से अकर्मनीय संस्कृति को बढ़ावा भी मिला. समाज से कटकर जंगल में तपस्या करने से लोगों के दुखों का निवारण संभव नहीं. जैसे-जैसे एकांत में तपस्या करने का मतलब अर्थहीन लगने लगा, वे अपने साथियों को जंगल में छोड़कर चले गए. विचरण करने के दौरान उनको गया, बिहार में पीपल के नीचे ज्ञान का बोध हुआ कि मध्यम मार्ग से ही दुनिया के दुख को मिटाया जा सकता है. इस तरह से उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई.

उन्होंने अपना प्रथम उपदेश अपने उन्हीं पांच सहयोगियों को दिया जिन्हें जंगल में छोड़ दिया था. जैसे ही सारनाथ में बैठे इन पांचों सहयोगियों ने सिद्धार्थ गौतम को दूर से आते देखा तो उन्होंने निश्चय कर लिया था कि जब वह पास में आएंगे तो उन्हें जलील करके भगा देंगे क्योंकि वे छोड़कर चले गये लेकिन हुआ कुछ उल्टा ही. जैसे ही सिद्धार्थ गौतम उपस्थित हुए, वे प्रभावित होकर दीक्षा ग्रहण कर लिए. इससे यह शिक्षा मिलती है कि समाज से अलग-थलग होकर बहुत कुछ नहीं किया जा सकता.
भगवान गौतम द्वारा माने गए चार आर्य सत्य आज भी उतना ही प्रासंगिक हैं जितना उस समय था. उनका पहला आर्य सत्य था कि संसार में दुख है. यदि दुख है तो उसका कारण भी है. कारण है तो निवारण भी है, यह उनका तीसरा आर्य सत्य था. चौथा आर्य सत्य है कि अष्टांगिक मार्ग. भगवान गौतम बुद्ध ने प्रकृति के नियमों को बड़ी ही बारीकी से समझा और उन्हें जीवन में लागू किया. आज लोग भ्रष्टïाचार, गरीबी, जाति-पाति, सांप्रदायिकता और बेरोजगारी से दुखी हैं. दुख का कारण कहीं तो है. यदि दुख के कारण को इंसान समझ ले तो उसका निवारण संभव है. अधिकतर लोग दुखी तो हैं लेकिन असली कारण को समझने में भूल करते हैं.
हजारों वर्ष से छुआछूत एवं भयंकर शोषण के शिकार लोग इसका कारण पूर्व जन्म के किये गए कर्मों को समझते रहे और अभी भी समझते हैं जबकि यह सत्य नहीं है. यदि सामाजिक सौहाद्र्र बिगड़ रहा है तो उसके पीछे भी कुछ स्वार्थी एवं शरारती तत्वों का ही हाथ होता है अर्थात् दुख का कारण कहीं ना कहीं होता है. एक तरह से यह एक वैज्ञानिक दृष्टिïकोण है. उनके द्वारा अष्टांगिक मार्ग जो बताया गया है यदि उसे हम जीवन में मान लें तो संसार में दुख को समाप्त किया जा सकता है. अष्टांगिक मार्ग- सम्यक् दृष्टिï, सम्यक् संकल्प, सम्यक्  वचन, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक्  स्मृति, सम्यक् समाधि है. उन्होंने इसके लिए किसी गुरु या कही-सुनी हुई बात को मानना बिल्कुल जरूरी नहीं कहा. हर इंसान अपना खुद का मालिक है. वह अपने कर्मों का ही प्रतिफल होता है ना कि किसी दैवीय शक्ति और अन्य कारण से.

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