भोपाल 1 जनवरी. मध्यप्रदेश की अर्थ-व्यवस्था का मुख्य आधार कृषि बीते पाँच वर्षों में किये गये प्रतिबद्ध प्रयासों के फलस्वरूप आज ऐसी स्थिति में आ गयी है कि सूखे और कम वर्षा जैसी प्रतिकूल स्थितियों में भी अब इसकी विकास दर नेगेटिव नहीं होती.

पहले ऐसी स्थितियाँ निर्मित होने पर यह दर एकदम निगेटिव हो जाती थी. वर्ष 2001-02 से कई वर्षों तक हर दूसरे साल यह नौबत आ जाती थी. वर्ष 2000 में कृषि विकास दर-28.29 हो गई. वर्ष 2002-03 में 19.64 रही. विशेषज्ञों के अनुसार मध्यप्रदेश में कृषि के क्षेत्र में किये गये सघन प्रयासों के चलते कृषि विकास का जो मजबूत आधार बना है उससे प्रदेश में निगेटिव कृषि विकास दर की बात अब इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगी. यह इस बात से सिद्ध होता है कि सूखे और 35 प्रतिशत कम वर्षा के बावजूद वर्ष 2009-10 में 9 प्रतिशत से अधिक कृषि विकास दर दर्ज की गई, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक थी. वर्ष 2009-10 में राष्ट्रीय कृषि औसत विकास दर नगण्य .04 प्रतिशत रही. वर्ष 2011-12 में कृषि विकास दर 10 प्रतिशत से अधिक रहने की संभावना है. ऐसा इसलिये हैं क्योंकि अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार गेहूँ के क्षेत्रफ ल में 15 प्रतिशत और चने के क्षेत्रफ ल में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. अन्य फसलों का रकबा भी बढऩे की संभावना है क्योंकि इस वर्ष मध्यप्रदेश में पूरे देश की तुलना में सबसे अच्छी वर्षा हुई है. सबसे अच्छी इस अर्थ में है कि सभी जिलों में समान रूप से और संतुलित वर्षा हुई है.

इस उपलब्धि में मुख्य रूप से सिंचाई सुविधा में वृद्धि तथा किसानों को दी गयी अनेक सुविधाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही. बीते 8 वर्षों में प्रदेश में 8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में अतिरिक्त सिंचाई क्षमता निर्मित की गई. वर्ष 2002-03 में सिंचाई क्षमता का 35 प्रतिशत उपयोग सिंचाई के लिये होता था, जबकि आज की स्थिति में निर्मित सिंचाई क्षमता का 50 प्रतिशत उपयोग सिंचाई के लिये हो रहा है. सिंचाई सुविधा के विस्तार में बलराम तालों और जलाभिषेक अभियान ने अहम रोल अदा किया है. बहते वर्षा जल को रोककर सिंचाई के उपयोग के लिए प्रदेश में कुल 8500 बलराम ताल निर्मित किये गये, जिनसे बड़े क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध हुई. इसी तरह जलाभिषेक अभियान के तहत 7 लाख से अधिक जल संरचनाएँ निर्मित की गई जिनसे लगभग एक लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा प्राप्त हुई.

इसके अलावा कृषि के विकास के लिए हर स्तर पर हर संभव प्रयास किये गये. बीते पाँच वर्षों में किसानों को 5 हजार करोड़ रुपए की विद्युत टेरिफ  सब्सिडी दी गयी. कृषि उपकरणों तथा खाद एवं बीज पर उन्हें अनुदान उपलब्ध करवाया गया. अनुदान की राशि किसानों के बैंक खातों में सीधे जमा करने की व्यवस्था लागू की गई. किसानों को 5 वर्ष में 19 हजार 750 करोड़ रुपए के सहकारी ऋण दिये गये हैं. किसानों को दिये जाने वाले ऋ णों पर ब्याज राशि को 16 प्रतिशत से घटा कर 7, फि र 5, फि र 3 और वर्ष 2011 में एक प्रतिशत कर दिया गया. कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में बेहतर समन्वय के लिए कृषि केबिनेट का गठन किया गया. गेहूँ उपार्जन पर 100 रुपए और धान पर 50 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बोनस दिया गया. ऐसा करने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य है. उपार्जन की राशि भी किसानों के बैंक खातों में सीधे जमा की जा रही है.

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