• बारदाने पर तकरार

थामस के खत से खफा शिवराज ने फिर लिखी चिट्ठी

भोपाल,28 अप्रैल,नभासं.मध्यप्रदेश में बारदानों को लेकर राज्य सरकार और कांग्रेस के बीच लड़ाई है कि थमने का नाम ही नहीं ले रही.मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज केन्द्रीय खाद्य आपूर्ति राज्य मंत्री द्वारा बारदाना आपूर्ति के संबंध में उन्हें लिखी चि_ी में दलीलों को नकारा है.

उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में जूट से बने बारदानों की कमी से उपजी दिक्कत की वजह सिर्फ 50 हजार गठानों की आपूर्ति की जाना ही नहीं है, बल्कि केन्द्रीय एजेंसियों द्वारा शुरूआती तौर पर उनके समक्ष रखी गई 2.69 लाख गठानों की तय समय पर आपूर्ति नहीं की जाना भी है.
मुख्यमंत्री ने इन तथ्यों पर गौर करने के लिये कहा है कि मध्यप्रदेश ने डीजीएस एण्ड डी को भेजे जूट बारदाना खरीदी के आदेश (इंडेण्ट) पर्याप्त समय पूर्व नवम्बर, 2011 और 3 तथा 15 फरवरी को ही भेज दिये थे. इनमें 2 लाख 69 हजार 230 गठानों की आपूर्ति की माँग की गई थी. उन्होंने यह भी बताया है कि इसके अलावा निजी क्षेत्र से खुली निविदा के जरिये भी 40 हजार गठानों की खरीद का आदेश दिया गया था. इन दोनों की कुल तादाद 3 लाख 9 हजार गठानें थी.

चौहान ने कहा कि जब हमारे अनुमानित उपार्जन की मात्रा बढ़कर 65 लाख मीट्रिक टन आँकी गई तब भी हमने इसे पूरी सतर्कता और गंभीरता का विषय मानकर 77 लाख 30 मीट्रिक टन गेहूँ भरे जाने के इंतजाम पर फरवरी, 2012 में ही कार्रवाई की. मुख्यमंत्री ने दृढ़ता से कहा है कि इन तथ्यों की रोशनी में केन्द्रीय राज्य मंत्री का यह आरोप ठीक नहीं है कि मध्यप्रदेश ने वास्तविक अर्थों में अपनी जरूरत की कोई योजना नहीं बनाई.

बढ़ते उपार्जन अनुमानों के मुताबिक कार्रवाई
मुख्यमंत्री ने कहा है कि गेहूँ उपार्जन के आगे बढ़ते अनुमान और इसकी संशोधित मात्रा के मुताबिक प्रदेश ने निरंतर समय रहते खरीदी आदेश दिये. अप्रैल के दूसरे सप्ताह हमने 50 हजार गठानों का खरीदी आदेश डीजीएस एण्ड डी को भेजा. उन्होंने कहा कि जूट बारदानों की कमी की वजह केन्द्रीय एजेंसियों द्वारा समय पर पूर्व के 2 लाख 69 हजार गठानों के खरीदी आदेश की पूर्ति नहीं करना भी है. इस 2.69 गठानों के आदेश के तहत शुक्रवार दिनांक 27 अप्रैल, 2012तक कुल 1.73 लाख गठानें ही मिली हैं, जबकि माँगी गई कुल गठानें देने की तारीख ही 30 अप्रैल तय की गई थी.

केन्द्रीय मंत्रालय ने क्या किया
मुख्यमंत्री ने इस पूरे घटनाक्रम में केन्द्रीय मंत्रालय द्वारा की गई कार्रवाई का खुलासा भी अपनी चि_ी में किया है. उन्होंने कहा है कि आपूर्ति का समय-चक्र आपके मंत्रालय ने 30 मार्च को बदल दिया था. उसने यह तय किया कि मई में दी जाने वाले 25 हजार गठानों को छोड़कर शेष सभी गठानें अप्रैल में सुपुर्द कर दी जायेंगी. मुख्यमंत्री ने कहा कि इसका मतलब बिलकुल साफ है कि अप्रैल में 88 हजार गठानें सुपुर्द की जानी थीं. इसके उलट प्रदेश को 1 से 26 अप्रैल के बीच सिर्फ 17 हजार गठानें ही मिली हैं और 71 हजार गठानों का अब भी बैकलॉग बना हुआ है.

20 मई तक शेष आपूर्ति की बात व्यावहारिक नहीं
मुख्यमंत्री ने इस बात पर ऐतराज जताया है कि केन्द्रीय राज्य मंत्री द्वारा अपनी चि_ी में फरवरी, 2012 के शुरूआती खरीदी आदेश की शेष 50 हजार गठानें 20 मई तक भिजवाने की बात कही है. उन्होंने कहा कि तब तक बहुत देर हो चुकेगी. उन्होंने याद दिलाया है कि चर्चा के दौरान भी मैंने बार-बार यह बात उठाई थी कि मध्यप्रदेश में उपार्जन सीजन 20 मई, 2012 को खत्म हो जाता है. इसी तरह डीजीएस एण्ड डी द्वारा कोलकाता में गठानों की जाँच और इसे आगे गुजारने के बाद भी रेक लोड करने में कम से कम दो दिन और उसके बाद इसके मध्यप्रदेश पहुँचने में न्यूनतम 4 दिन लगते हैं. इसी तरह फिर यहाँ प्रदेश के सभी 2,313 केन्द्रों तक जिनमें से कई दूर-दराज तक फैले हैं.

प्लास्टिक बैग्स में भी नहीं सहयोग
मुख्यमंत्री ने चिट्ठी में यह भी कहा है कि आपसे इस साल के लिये एचडीपीई प्लास्टिक बैग्स की 40 हजार गठानों के इस्तेमाल की छूट का अनुमोदन 11 दिन पहले माँगा गया था. इसका हम आज भी इंतजार कर रहे हैं. इसके उलट आपने चि_ी में ऐसे ही प्लास्टिक बैग्स की 4,739 गठानों का उल्लेख कर गफलत में डाल दिया है. सच्चाई यह है कि यह बैग्स दो साल पहले वर्ष 2010 में खरीदे गये थे. उस साल इनके इस्तेमाल के बाद शेष का उपयोग भी पिछले साल प्रदेश में हो चुका है.

प्लास्टिक बैग्स खरीदी जरूरी
मुख्यमंत्री ने चिट्ठी  में यह भी साफ कर दिया है कि उपरोक्त मुश्किल हालात में प्रदेश ने प्लास्टिक बैग्स की 60 हजार गठानों के इस्तेमाल की आपसे औपचारिक मंजूरी का शुक्रवार को फिर आग्रह किया है. आप 40 हजार गठानों के लिये कार्रवाई शुरू कर चुके हैं, उम्मीद है कि शेष पर अब प्राथमिकता से कार्रवाई होगी. मुख्यमंत्री ने चिट्ठी में कहा है कि आपूर्ति किये जाने वाले 3 प्रतिशत बारदाने खराब और अनुपयोगी होते हैं. इन्हें जब आगे खरीदी केन्द्रों तक पहुँचाया जाता है तो बारदानों की उपलब्धता इसलिये और मुश्किल हो जाती है कि प्रत्येक खरीदी केन्द्र पर किलो के हिसाब से खरीदी का पूर्वानुमान असंभव होता है.

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