दबाव की राजनीति इस देश के लिये अन्दरुनी तौर पर तो घातक बनती ही जा रही है. लेकिन अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में भी उसे इसके कारण उसे बड़ी कठिन और अपमानजनक स्थिति में जाना पड़ सकता है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कमीशन में उसका श्रीलंका के विरुद्ध मत देना दबाव की राजनीति में की गई बहुत बड़ी भूल है, जिसके आगे कभी भी गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

श्रीलंका में लिट्टï भारत में चले आ रहे नक्सली या अन्य आतंकवादी संगठनों की तरह महज एक आतंकी संगठन नहीं था. वह भारत के 1947 से पहले की जिन्ना की मुस्लिम लीग की तरह का देश विभाजन की मांग का आतंकवादी आन्दोलन था. जो श्रीलंका के उत्तर भाग को देश विभाजन के जरिये ‘तमिल ईलम’ राष्ट्र बनाने के लिये देश से आतंकवादी युद्ध कर रहा था. उसने अपनी खुद की फौज, नौसेना व वायुसेना भी बना ली थी. हवाई हमले शुरु कर दिये थे. तब श्रीलंका ने फौजी कार्यवाई करके लिट्टï का हमेशा के लिये खात्मा करके देश की एकता व प्रभुसत्ता को बचाया. पिछले कई सालों से श्रीलंका के उत्तरी भाग में श्रीलंका की सरकार ही नहीं थी- वहां लिट्टï का अवैध विद्रोही शासन चल रहा था. फौज व पुलिस की ज्यादतियां नहीं होती हैं बल्कि वे ज्यादतियां रोकने की कार्यवाहियां होती हैं.

भारत विभाजन के बाद भी पाकिस्तान इस्लामी जुनून से आतंकवाद चला रहा है और काश्मीर के साम्प्रदायिक मुसलमान भी उसकी शह पर पृथक राष्ट्र की मांग कर रहे हैं. हमें भी अपने देश की हिफाजत के लिये काश्मीर में आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट के तहत फौजी कार्यवाही करनी पड़ रही है. यहां भी आतंकवादी भारतीय फौजों पर आये दिन अमानवीय ज्यादतियों के आरोप लगाये हैं. वे फौजों को वापस बुलाने की और आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट को खत्म करने की मांग कर रहे हैं.

देश के अन्दरुनी भाग मणिपुर में भी आतंकवादी विद्रोही आर्मी को वापस बुलाने व आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट को खत्म करने की मांग कर रहे थे. साधारण परिस्थितियों में राज्यों की पुलिस ही कार्यवाही करती है. पुलिस भी तब ही कार्यवाही करती है जब स्थिति हिंसा से गंभीर हो जाए. हर पुलिस फायरिंग पर ज्यादती और मानव अधिकार हनन का आरोप लगता है. जब स्थिति पुलिस के बूते से भी बाहर हो जाती है- तभी सरकारों को आर्मी को स्पेशल पावर देकर भेजना पड़ता है. आर्मी उन कठिन परिस्थितियों में काम करती है जहां देश की रक्षा का सवाल हो. आज संसार में जो स्थिति हो गई है, उसमें दो राष्ट्रों के आपसी युद्ध से ज्यादा खतरनाक राष्ट्रों के विरुद्ध आतंकवाद का चलना है.

राष्ट्रों के बीच के युद्ध में कुछ ही दिनों युद्धविराम और युद्ध भी समाप्त हो जाता है. लेकिन आतंकवादी कार्यवाही चलती ही रहती है. इसमें निर्दोष ही एकाएक किये गये हमलों में मारे जाते हैं. आतंकवादी सतत मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं. देश में नक्सली भी मानवाधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं. इन दिनों इटली के पर्यटकों और विधायक को ओडि़सा में बंधक बनाना भी मानवाधिकार का उल्लंघन है. लिट्टï के आतंकी कार्यवाहियों में श्री राजीव गांधी हत्या करना भी मानवाधिकार का उल्लंघन था उसने देश में सश विद्रोह किया था. कल भारत के खिलाफ भी काश्मीर व नक्सली आतंकियों के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये भी संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कमीशन ऐसा प्रस्ताव आ सकता है? दबाव की राजनीति आत्मघाती हो गई है.

 

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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