ऐसी विश्वव्यापी मान्यता है कि फौजों पर खर्च प्रत्यक्ष रूप से अनउत्पादक होता है लेकिन परोक्ष रूप से रक्षा और सुरक्षा के वातावरण के बिना विकास व जीवन दोनों ही अवरुद्ध होते हैं. देशों में पुलिस का अस्तित्व ही इसलिए होता है कि समाज में अपराधी होते हैं. लेकिन यह खर्च भी जरूरी होता है. कानून व्यवस्था को राज व्यवस्था का प्रथम व अनिवार्य कर्तव्य माना जाता है. लेकिन जब इन पर अत्याधिक व्यय होने लगे तो निश्चित ही यह प्रश्न सामने आता है कि देश की बाहरी व अंदरूनी स्थिति बदतर होती जा रही है.

भारत इस समय इसी दुरुह स्थिति से गुजर रहा है. सन् 1962 में चीन के हमले के बाद देश में फौजी तैयारी में पूरा ध्यान देना पड़ा और आज हम बहुत महंगा मिसाइल कार्यक्रम चला रहे हैं. पाकिस्तान चीन के साथ हुए युद्धों और राजनैतिक तनावों के कारण यह जरूरी भी है. पिछले कई सालों से देश की आंतरिक सुरक्षा को भी नक्सल हिंसा से बड़ी गंभीर चुनौती मिली हुई है. यह पश्चिम बंगाल के आदिवासी क्षेत्र नक्सलवाड़ी क्षेत्र में मामूली आदिवासी आंदोलन के रूप में उपजा और बंगाल, बिहार, झारखंड, ओड़ीसा, आंध्र, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश व महाराष्टï्र तक फैल गया है. यहां इनकी समानांतर सरकार कायम हो गई है. इस्सार जैसे बड़़े औद्योगिक घरानों से भी वहां काम करने के लिए लाखों रुपयों का सुरक्षा टैक्स वसूल करते हैं. इनके पास फौज की तरह आधुनिक हथियार हैं.

दंतेवाड़ा में 75 सीआरपी के जवान मारे गए तब पता चला कि सीआरपी का ही एक कांस्टेबिल इलाहाबाद में इन लोगों को पुलिस के हथियार चुरा कर देता था. विदेशी अवैध हथियार मरचेंटों से भी इन्हें हथियार मिल रहे हैं. इसके पास फिरौती और अफीम व ड्रग की तस्करी करने से भी बहुत धन प्राप्त हो रहा है. स्थिति इतनी गंभीर है कि आंतरिक सुरक्षा पर केंद्र सरकार ने सुरक्षा बजट में 500 प्रतिशत की अप्रत्याशित वृद्धि करने का फैसला लिया है. अभी तक केंद्रीय गृह मंत्रालय का आंतरिक सुरक्षा का बजट 10,322 करोड़ रुपये हुआ करता है. उसे अब बढ़ाकर 52,839 करोड़ रुपये किया जा रहा है. लेकिन इस सबके बावजूद यह नजर नहीं आ रहा है कि नक्सली आतंक खत्म हो रहा है. वह बढ़ता ही जा रहा है. यह तो बिना किसी परिणाम पाये रुपया डुबाना है. यदाकदा यह कहा जाता है कि नक्सल प्रभावी क्षेत्रों में विकास कार्य तेज किये जाएं.

सड़कों व अन्य निर्माण कार्यों के ठेकेदार, बड़े कारखाने वाले बिना उन्हें चौथ दिए वहां काम नहीं कर सकते तो वहां विकास होगा कैसे और अभी इतने वर्षों तक किया क्यों नहीं जा सका. जबकि यह माना जा रहा है कि वहां विकास कार्यों से नक्सलवाद खत्म हो जायेगा. फिर सुरक्षा के लिये 500 प्रतिशत की वृद्धि क्यों की जा रही है. इसे विकास में लगाकर नक्सल आतंक खत्म कर लें. श्रीलंका के राष्टपति श्री महेन्दा राजपक्षे ने एक मुश्त फौजी कार्यवाही करके लिट्टे के आतंक को खत्म कर दिया. उसके बाद से श्रीलंका में सुरक्षा की भावना आ गई. विदेशी निवेशक व उद्योग आने शुरू हो गये. वहां विकास की लहर आयी है. इतनी भारी भरकम फंड वृद्धि नक्सल के नाम पर गृह मंत्रालय कर रहा है तो उसे एक अंतिम कार्यवाही में नक्सलियों का सफाया करना है, तभी वहां विकास संभव है. अन्यथा विकास की बात बकवास और कर्तव्यहीनता है.

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