सावन-भादों में भारी वर्षा होती ही है, झल्ले भी आते हैं और झड़ी भी लगती है. इस समय सावन में वर्षा हो रही है भादों अभी बाकी है. मौसम के हिसाब से सभी कुछ सामान्य हो रहा है. अगर कुछ असामान्य है तो यही कि वर्षा में कुछ अंतराल आ जाने से अभी उतनी वर्षा नहीं हुई जितनी अब तक हो जानी थी. कुछ दिनों पहले ही अनुमान था कि वर्षा 21 से 23 सेंटीमीटर कम रही. लेकिन सावन की राज्य भर में इस झमाझम से काफी कमी पूरी हो जायेगी. वर्षा की तीन स्थितियां होती है- 1. सामान्य, 2. अल्प, व 3. अधिक वर्षा. अभी हम अल्प वर्षा के काल में है.

अधिक वर्षा वहीं होगी जो सामान्य वर्षा से ज्यादा होगी. इसलिए इस समय की भारी वर्षा में भी अधिक वर्षा की स्थिति नहीं है. लेकिन हमारा जन जीवन जरूर असमान्य हो गया है और यह धारणा ही अपने आप में असामान्य है. सब तरफ शोर हो रहा है आष्टï, इटारसी डूब गये, पूरे नगर तालाब बन गये, अलीराजपुर खाली कराने की नौबत आ गई, नदियां पुलों से ऊपर बह रही है, नाले ऊफान पर है, मकान ढह गये, नगर टापू बन गये, सड़क संपर्क टूट गये, भारी बारिश से तबाही, बिगड़े हालात, मकानों में पानी भरा, रिकार्ड तोड़ वर्षा, घनघोर वर्षा. ऐसा लग रहा है कि हम अभी तक “सूखे” के आपातकाल से “गीले”  के आपातकाल में आ गये. जैसे हम कुएं से निकलकर खाई में गिर पड़े हो. कुछ दिनों पहले ही हल्ला मच रहा था कि खेती तबाह हो गयी, खायेंगे क्या, नदियां तालाब सूख रहे हैं, भूजल भी गायब हो गया- पीयेंगे क्या? भाखड़ा बांध तक खाली हो गया.

दो बरस पहले ही सावन भादो सूखे चले गये थे. उसे “खंडित वर्षा” का नाम दिया गया था. तय माना जा रहा था कि सूखा पड़ ही गया. लेकिन भादों के बाद नवम्बर-दिसम्बर में वर्षा आकर भरपूर पानी दे गई. खेत भी सम्हल गये. ठंड के करीबी महीनों में वर्षा आई थी संभवत: इसलिये पाला पडऩा भी कहा गया था. सामान्य वर्षा में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाना हमारी खुद की बनाई आपदा है. नाले-नदियों तक में अतिक्रमण हो गये- खेत या मकान बना डाले. नगरों में मकानों की बाढ़ से ही पानी की बाढ़ आती है. पानी बरसा पर निकलने का रास्ता नहीं, उस हालत में और क्या होगा. समुद्र किनारे बसा मुम्बई महानगर ही इसी कारण हर बरसात में दूसरा समुद्र बनकर उसमें डूब जाता है. यही हाल हर नगर गांव का है. ‘खुले शौचालय और बन्द नालियां’ ही हमारी संस्कृति बन गये हैं. कुछ दशकों पूर्व मुरैना नगर लगभग जलमग्न होने पर आ गया था. फौरी तौर पर नाले में बने मकानों को तोड़कर पानी निकाल के शहर बनाया गया. यदि हम नहीं चेते तो कभी यह स्थिति हर नगर में आने वाली है.

एक अध्ययन में पता चला कि क्षिप्रा की 13 सहायक नदियां अतिक्रमण में गायब हो चुकी हैं. नदियों के किनारे आबादी और गंदगी से पट गये हैं. झील तालाब और नदियां तक प्लास्टिक, पन्नी से पटते जा रहे हैं. बड़े बांधों को बनाते वक्त कहा गया था कि इनसे बाढ़ में नियंत्रण भी होगा. लेकिन ये मिट्टी से इतने भर गये हैं कि अब पानी भरने के लायक ही नहीं रहे. जरा में सूखने भी लगते हैं. भोपाल में बड़े तालाब को गहरा करने का अभियान भी चला था. यह अभियान भी ‘समारोह’ बनकर रह गया. तगाड़ी उठाओ, फोटो खिचाओ और चलते बनो. वर्षा सामान्य है, हम अपने आप में असामान्य हो गये हैं.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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