पांच साल तो कुछ चला नहीं

लखनऊ, 11 अप्रैल.  दोपहर के लगभग 12.30 बजे हैं. पिछले पांच साल में जिस कालीदास मार्ग के पांच नंबर बंगले के सामने परिंदा भी नहीं दिख सकता था, वहां दिख रहे हैं अनगिनत सिर. गाडिय़ां खड़ी हुई. सुरक्षा कर्मी मुस्तैद पर, मूकदर्शक. कहीं कोई रोक नहीं और न टोकाटाकी.

मुख्यमंत्री से मिलने जाने वालों के लिए बने दरवाजे पर सुरक्षा कर्मी तैनात लोगों से हंसकर बात करते हुए. अंदर जाकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलकर उनके सामने अपनी समस्या रखने की जिद करने वालों को यह समझाते हुए, ‘आज विधायकों, सांसदों और पूर्व विधायकों और सांसदों से ही मुख्यमंत्री को मिलना है. इसी बीच आवाज सुनाई देती है, ‘अरे! वाटर कूलर तो काम ही नहीं कर रहा है. थोड़ा-थोड़ा पानी आ रहा है. पानी कहां मिलेगा. बगल में खड़ा सुरक्षा कर्मी हंसते हुए कहता है, ‘पांच साल तो बेचारा चला नहीं. इसलिए मशीनरी जाम हो गई.

अब चलना शुरू हुआ है तो धीरे-धीरे ही चलेगा.Ó भीड़ से कोई बोलता है, ‘भगवान करे आगे से प्रदेश की मशीनरी जाम न हो. इसी बीच, हरा-कुर्ता पहने एक सज्जन गाड़ी से उतरकर प्रवेश द्वार पर पहुंच जाते हैं. सुरक्षा कर्मी सैल्यूट करते हैं और उनसे मोबाइल फोन बाहर किसी को देने का आग्रह करते हुए उन्हें प्रवेश दे देते हैं. किसी की आवाज आती है, ‘अरे! यह तो सुल्तानबेग गए हैं. बसपा से विधायक हैं.’ दरवाजे पर खड़ा सुरक्षाकर्मी कहता है, ‘पार्टी से क्या होता है. किसी भी पार्टी का मौजूदा और पूर्व जनप्रतिनिधि मुख्यमंत्री से मिल सकता है. मुख्यमंत्री किसी पार्टी का थोड़े होता है.’ एक विधायक अंदर दो लोगों के साथ जाने लगते हैं तो सुरक्षाकर्मी उनसे अकेले जाने आग्रह करते हैं. विधायक कहते हैं, ‘अरे! यह हमारे जिला अध्यक्ष हैं. जिला अध्यक्ष के बगैर विधायक का क्या मतलब. फिर वह जिलाध्यक्ष का हाथ पकड़े अंदर चले जाते हैं.’

घड़ी की सुई 1 पर पहुंच चुकी है और उसी के साथ बढ़ चुकी है फरियादियों की भीड़. किसी को जमीन को कब्जे से मुक्त कराना है तो बीएड बेराजगार भी नौकरी की चाहत में मुख्यमंत्री से मुलाकात कर लेना चाहते हैं. बात शायद अंदर तक पहुंचती है. थोड़ी देर बाद एक सुरक्षाकर्मी फरियादियों से प्रार्थनापत्र लेने लगता है. भीड़ को बताया जाता है, ‘मुख्यमंत्री जी ने सभी प्रार्थना पत्रों को मंगाया है.Ó पर, कुछ लोग मुख्यमंत्री के हाथ में ही प्रार्थनापत्र देना चाहते हैं. इस बीच, एक-एक करके कई विधायक और सांसद मुख्यमंत्री आवास के अंदर जा चुके हैं. मुख्यमंत्री आवास के बाहर जमा मीडिया को अब यह जिज्ञासा है कि कोई विधायक या सांसद बाहर निकले तो कम से कम अंदर के माहौल का अंदाज लग सके.

इस बीच, एक भगवा वेशधारी भी मुख्यमत्री आवास पर पहुंचकर मुख्यमंत्री से मिलने की जिद करने लगता है. भीड़ का दबाव बढ़ता है तो बाहर आते हैं मुख्यमंत्री के सुरक्षा अधिकारी शिवकुमार. बीएड बेरोजगारों से कहते हैं, ‘मैं भी 1977 का बीएड हूं. आपसे हमदर्दी है. पर, एक-एक व्यक्ति के लिए सरकार नीतिगत फैसला नहीं कर सकती. सरकार विचार कर रही है. आप लोगों की समस्याओं पर भी और बीटीसी, विशिष्टि बीटीसी या शिक्षक पद की अन्य योग्यता रखने वालों की समस्याओं पर भी. सब पर फैसला होगा. कम से कम कुछ समय तो दें सरकार को.

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