राजधानी भोपाल के आसपास खुले जंगल में बाघ का पाया जाना एक शुभ संकेत है. अभी तक भोपाल के वन विहार में उनके बाड़ों में बंद शेर देखे जाते हैं. वे काफी खुले में प्राकृतिक जीवन का लाभ लेते हैं लेकिन खुले जंगल का बाघ कुछ और ही होता है. एक बाघ केरवा, कलियासोत, रातीबड़ के इलाके में अपना सीमा क्षेत्र बना रहा है. यह उसका प्राकृतिक क्रियाकलाप है. वन विहार में उसे मांस दिया जाता है. लेकिन इस खुले बाघ ने कई जानवरों का शिकार कर स्वयं अपना भोजन जुटाया. जानवर मारे गए इस पर शासन चिंतित भी हुआ और उसने उन लोगों को मुआवजा भी दिया जिनके जानवर मारे गए. लेकिन एक अच्छी खबर यह भी आई कि इस बाघ के दहाडऩे से उस क्षेत्र में जानवरों का खेती को नुकसान पहुंचाना काफी कम हुआ और फसल में वृद्धि आई.

भूतपूर्व वन अधिकारी श्री लाड ने इस उपलब्धि की ओर जनता का ध्यान खींचा है. उनके अनुसार बाघ प्रजाति वास्तव में प्रकृति द्वारा नियुक्त वे फॉरेस्ट गार्ड हैं जिनकी वजह से उस क्षेत्र के जंगल व खेती सुरक्षित रहती है. इन्हें शिकार से खत्म करने या अभयारण्यों के बाड़ों में बंद कर रखने से जंगल के वास्तविक व प्राकृतिक फॉरेस्ट गार्ड ही खत्म हो गए. इसी कारण जंगल काट दिये गए. साथ ही नीलगाय, हिरण आदि वनस्पति खाने वाले जानवर की संख्या बढ़ गई. इससे प्रकृति का संतुलन भी बिगड़ गया और जंगल के रूप में पर्यावरण ही खत्म हो गया. हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि बाघ प्रजाति हफ्ता-पंद्रह दिन में केवल भोजन के लिए शिकार करता है. इससे जंगलों में वनस्पति चरने वाले जानवरों की संख्या अत्याधिक नहीं हो पाती. यह एक प्राकृतिक संतुलन है. जैसे वनों में सभी प्रजातियों के मिश्रित वन होते हैं उसी तरह कई पशु प्रजातियां भी मिश्रित तौर पर निवास करती हैं. जंगलों में फलदार वृक्ष खत्म कर दिये गये हैं. इसी की वजह से दिल्ली जैसे महानगरों में व अन्य नगरों में बंदर भारी संख्या में आ गए हैं. हम जंगलों का प्राकृतिक संतुलन बनाकर ही पर्यावरण की वास्तविक रक्षा कर सकेंगे.

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