प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने हाल के वर्षों से अब तक चली आ रही मुद्रास्फीति, मूल्यवृद्धि और हाल में डीजल, रसोई गैस व एफ.डी.आई. के निर्णयों का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के हित व सुरक्षा के लिये कड़े कदम उठाना कहा. इन्हें अत्यन्त आवश्यक व अनिवार्य निर्णय कहा गया.

इसकी एक बड़ी वजह लम्बे अर्से से चला आ रहा वित्तीय घाटा बताई जा रही है. यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा लगातार बढ़ते हुए घाटे के बजट और वित्तीय घाटा किसी भी देश के लिये बड़े घातक हो जाते हैं. यूरोपीय संघ का देश ग्रीस लगभग दिवालिया हो गया और अन्य राष्टï्रों से लिये गये कर्जे नहीं चुका पाया. अन्य राष्ट्रों को उसे उबारने के लिये आर्थिक व वित्तीय मदद देनी पड़ी. इनमें भारत भी शामिल है, जो अन्तर मुद्रा कोष की मार्फत उसे 40 हजार करोड़ डालर की आर्थिक मदद दे रहा है.

वित्तीय घाटे की वजह यह बताई जा रही है कि बहुत ज्यादा सब्सिडी देने से वित्तीय घाटे की स्थिति संकट की स्थिति में पहुंच गई है. पेट्रोल, डीजल, घासलेट, रसोई गैस की एक ओर खपत बढ़ रही है और दूसरी ओर अन्तरराष्टï्रीय बाजार में पेट्रो क्रूड की कीमतें बढ़ती जा रही हैं. लेकिन इस यथार्थ से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि सरकार का वित्तीय घाटा उच्च राजनैतिक, शासकीय व प्रशासनिक स्तर पर बढ़ता जा रहा है वित्तीय भ्रष्टाचार भी है. टू जी स्पेक्ट्रम और कोयला आवंटन में भारी वित्तीय नुकसान सामने आ चुका है. चपरासी -बाबू से लेकर केंद्र मंत्रियों तक के पास करोड़ों की अवैध संपत्ति निकल रही है. विदेशों में जहां भारी मात्रा में काला धन है, वहीं देश के अंदर भी भ्रष्टाचार व रिश्वत खोरी में भी इतना काला धन है जो संभवत: विदेशों में जमा काले धन से भी ज्यादा होगा.

नक्सली आतंक व विध्वंस बढ़ते हुये पूर्व से मध्य व पश्चिम भारत के 8 राज्यों में फैल गया है. हर रोज पुलिस और केंद्रीय अद्र्ध सैन्य बलों पर इन इलाकों में करोड़ों रुपये खर्च हो रहा है. यह निरंतर हो रहा व्यर्थ का खर्च इसलिये है कि इससे हासिल कुछ नहीं हो रहा. नक्सली समस्या बढ़ती ही जा रही है. श्री लंका के राष्टï्रपति श्री महेन्दा राजपक्षे ने देश में 26 साल से लगातार चले आ रहे लिट्टे के आतंक का एक हल्ले में सफाया करके न सिर्फ अपने राष्टï्र की सुरक्षा बहाल की बल्कि लिट्टे को नियंत्रित करने में हो रहा अरबो खरबों रुपये का खर्चा भी बचा लिया. लिट्टे भी लगभग नक्सलवाद की तरह आंतरिक आतंक का विद्रोह था.

भारत सरकार और राज्य सरकारों को इस नक्सली आतंक को बिना खत्म किये करोड़ों रुपये रोज खर्च करना भी सरकारों के वित्तीय घाटे का बहुत बड़ा कारण है. इसके अलावा भी अब सामान्य रूप से चलने वाले हिंसक आंदोलन व कई राज्यों में विद्रोह की स्थिति पर राष्टï्र का बहुत धन खर्च हो रहा है. यदि ये समस्याएं निपटा ली जाए जो सरकारों का कर्तव्य है, तो वित्तीय घाटा भी खत्म हो जायेगा और यह रुपया विकास में  लग जायेगा.

प्रधानमंत्री पेट्रोल, डीजल, केरोसिन, रसोई गैस और एफ.डी.आई पर ‘कड़े फैसलेÓ की बात कर रहे है. वे नक्सलवाद मंत्रियों व उच्च अफसरों में व्याप्त भ्रष्टïाचार पर ‘कड़े कदमÓ की बात क्यों नहीं करते. इन्हें खत्म करके वित्तीय घाटा पूरा हो सकता है. जनतंत्र में शासकीय निर्णय और विपक्ष के विरोध की राजनीति मान्य है और हमेशा चलती ही रहेगी. लेकिन यह सब संविधान की मर्यादा में ही जायज है. राज्यों की सीमाएं केंद्र सरकार व संसद ने निर्मित व निश्चित की है. लेकिन केंद्र सरकार की सीमा तो पूरा भारत वर्ष है और राज्य उसमें समाहित है. अमेरिका में राज्यों को केंद बनाया है लेकिन भारत में केंद्र ने राज्य बनाये है. केंद्र सरकारें भंग भी करता है.

केंद्र सरकार जो निर्णय लेती है वह पूरे देश पर लागू होता है. कई राज्य सरकारें एफ.डी.आई. का विरोध कर रही है. लेकिन केंद्र का फैसला लागू न करना संविधान के विरुद्ध है. इससे देश में और विश्व भर में यह सिद्ध होगा कि भारत सरकार का निर्णय पूरे देश में लागू नहीं होता. क्या केंद्र की सत्ता उन्हीं राज्यों में है जहां यूपीए की सरकारें है. केंद्र ने जो फैसला कर लिया उसे पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए. कुछ राज्यों का उससे इंकार करना असंवैधानिक विद्रोह है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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