परिवर्तनों की भी एक श्रृंखला होती है. इस समय वैज्ञानिक ज्ञान और विकास के कारण प्रकृति से द्वंद बढ़ता जा रहा है. स्थितियां और परिस्थितियां हर समस्या का कोई न कोई निदान-समाधान निकाल ही लेती है. कभी यह बड़ा धर्म-पुण्य का काम होता था कि सड़कों के किनारे पथिक विश्राम के लिए घनी छाया वाले व फलदार वृक्ष लगाये और ठहरने के लिए धर्मशालाएं बनवाएं. इनमें शब्द ”धर्म” ही यह बताता है कि विश्राम स्थल धंधा नहीं बल्कि धर्म होता था. अब कई धर्मशालाएं इसलिए लॉज, होटल व अन्य व्यवसायिक स्थान बन चुकी हैं क्योंकि इसमें ठहरने वाले धंधे के होटलों-लॉज में ठहरने लगे. अब सड़कों के किनारे पथिक चलते हुए नहीं आते बल्कि वाहनों में आने लगे. अब उस अर्थ में वृक्ष नहीं चाहिए कि पथिक उनकी छाया में विश्राम कर सकें अब उसे वृक्ष नहीं विश्राम गृह चाहिए.

अब सड़कों के किनारे वृक्षों व बिजली के खंभों में सह अस्तित्व हो नहीं सकता. दोनों को एक दूसरे से दूर करना ही होगा. वरना एक जगह वृक्ष गिरेगा और बिजली का तार ऐसा टूटता है कि इससे एक बड़ा इलाका अंधकार में और  सड़क पर वृक्ष गिरने से यातायात भी कई किलोमीटर तक जाम हो जाता है. जो कई जाम पीकर गाड़ी चलाते हैं वे भी जब जाम में फंसते हैं तो जाम का नशा काफूर हो जाता है. शायद इसका कभी कोई वैज्ञानिक निदान निकल आए. इलेक्ट्रानिक और नैनो टेक्नोलॉजी के युग में कुछ भी असंभव नहीं रहा. पता नहीं कब क्या निकल आए और एक अनुसंधान गायब हो जाए. कुछ दिनों पहले टेलेक्स और पैजर आये. अब ये नाम ऐसे लगते हैं कि जैसे किसी पुरातत्वीय वस्तु के बारे में कहा जा रहा है.  नैनो टेक्नोलॉजी ने सूक्ष्मतम को महानतम शक्तिमान बना दिया है.

हम टेलीफोन की लैंडलाइन से मुक्त हो गये है. जो तार बचे है वे केबिल के रूप में अंडर ग्राउंड हो गये. हो सकता है विज्ञान के इस युग में कभी मोबाइल जनरेटर भी बन जाए और हर बिजली की ‘लैंड लाइनÓ से मुक्ति पा जाए. मोबाइल फोन में कैमरा व व्हायस रिकार्डिंग आ गया. हो सकता है इसी में जनरेटर भी आ जाए. लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता तब तक वृक्षों और बिजली की लैंड लाइन को सहअस्तित्व के स्थान पर पृथक  अस्तित्व देना होगा. दोनों सड़क किनारे होने से अब आये दिन त्रासदी का कारण बन गये हैं. यह बहुत गंभीर समस्या बन चुकी हैं. अब यह मानदंड तय करना ही होगा कि वृक्ष और बिजली के तार खंबे एक-दूसरे से कितनी दूर रहे.

झाड़ गिरने तार टूटने की घटनाएं दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई व जीवन के विकास के लिये बिजली पहुंच गई है. वहां शार्ट सर्किट जैसी दुर्घटनाएं तो सुनने नहीं आयी लेकिन यह जरूर हो रहा है कि स्पार्किंग से खेत जल जाते है. सीधा तार डालकर बिजली चुराने से भी आग की बड़ी वारदातें हो रही हैं. मानव जीवन के लिये शुद्ध वायु व उन्नत पर्यावरण वातवरण के लिये वृक्षों का होना जीवन का होना ही होता है. आज की दुनिया में वनों पर सभी राष्ट्रों के चिंता औरजीवन को खतरा पैदा हो गया है. एक बड़े बजट की यह योजना भी बनानी ही होगी कि वृक्ष व बिजली के तार एक निश्चित दूरी से एक-दूसरे से दूर रहें.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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