सैहाद्री पर्वत श्रृंखला की सतत् कृपा से इस साल भी मुंबई और उसका पश्चिमी घाट मानसून से सराबोर और उसके हर जल स्रोत लबालब भर गए और पंजाब व उसकी आन-बान-शान बना भाखरा डेम सूख रहा है. दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान व उत्तरप्रदेश भयंकर गर्मी की चपेट में है. उत्तर प्रदेश की कई छोटी व मध्यम लम्बाई की नदियां सूख गई हैं.

दूसरी ओर उत्तर पूर्व का असम राज्य बरसात व बाढ़ से कुछ ही दिनों में इतना तबाह-बरबाद हो गया कि प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह व श्रीमती सोनिया गांधी वहां हवाई सर्वे कर आए. असम को केंद्र से बाढ़ राहत व पुनर्वास के लिए करोड़ों का पैकेज मिल गया. सैहाद्री पार का महाराष्टï्र, मध्यप्रदेश व बाकी उत्तर व पूर्व के राज्यों में मानसून आने से लगभग एक माह की देर हो चुकी है. खेतों में बोवनी रुकी पड़ी है और किसान सूखे की आशंका से परेशान होने लगे हैं. यदि मानसून लंबा खिंच गया तो खेती पर बहुत बुरा असर पड़ जायेगा. केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शरद पवार ने यह माना कि महाराष्ट, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश व बिहार, कर्नाटक में बोनी करने में देरी हो गयी है. लेकिन मानसून की हालत चिंताजनक नहीं है और अभी यह नहीं कहा जा सकता कि सूखे की स्थिति आ गई है.

अभी तक देश में जितनी वर्षा हो जानी चाहिए थी उससे 31 प्रतिशत कम हुई है. वर्षा पूर्व मानसून की वर्षा कई जगह हो चुकी है और उससे लगा हुआ ही मानसून आ जाता है ऐसा न होने से मौसम में आद्र्रता की वजह से लोग उमस बढऩे से सूखी गर्मी से भी ज्यादा परेशान हो जाते हैं.

हाल ही में रबी फसलों में गेहूं की न सिर्फ सर प्लस बल्कि ‘ओवर फ्लोÓ बम्पर फसल आ गई है. गोदाम भी उफन पड़े हैं. इसलिए यदि सूखा जैसी स्थिति कम या ज्यादा बन भी जाती है तो तब भी अकाल जैसी स्थिति आने का तो सवाल ही नहीं होता. अब केंद्र व राज्य सरकारों के पास खाद्यानों का इतना ज्यादा बफर स्टाक रहने लगा है कि हम अक्सर गेहूं, चावल, शक्कर व प्याज, कपास का निर्यात भी करते रहते हैं. रबी की मुख्य फसल गेहूं व खरीफ की मुख्य फसल चावल है. पिछले वर्ष 2011 की तुलना में धान अभी तक लगभग 2 लाख एकड़ कम बोई गई है. धान पानी भरे खेत में ही संभव है. उसके लिए भरपूर बरसात होना जरूरी है. इस समय व उत्तर पूर्वी में कुछ ही दिनों में अत्याधिक बरसात होने से वहा धान की रुपाई काफी बढ़ ही जायेगी. इसलिए धान में चिंता का विषय नहीं है.

लेकिन मध्य व पश्चिम राज्यों में मक्का, ज्वार, बाजरा पर असर पड़ गया है. सामान्यतया यह मोटा अनाज की फसलें 25 लाख एकड़ तक में बोई जाती हैं. लेकिन इस वर्ष इनका रकबा काफी घट कर 14 लाख एकड़ रह गया है. इसमें गेहूं की उपभोक्ता खपत व व्यापारिक उठाव ज्यादा रहेगा. दालों की बुवाई भी पिछले वर्ष की तुलना में लगभग दो लाख एकड़ कम हो गई है. लेकिन कुछ फसलों में जैसे कपास में लगभग 7 लाख एकड़ और गन्ना 3 लाख एकड़ से ज्यादा बोया गया है.

मौसम विभाग ने कहा है कि जुलाई-अगस्त में मानसून अच्छा रहेगा और जून की कमी पूरी हो जायेगी. अभी ऐसी देर नहीं हुई है कि लोग उसके लिये चिंतित हों, मानसून अभी आया ही है गया नहीं है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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