भोपाल, 3 नवम्बर. प्रत्येक मनुष्य अपनी चेतना का जीवन जीता है. धन का आकर्षण अपनी चेतना पर उसी प्रकार आक्रमण करता है जिस तरह वैक्टीरिया शरीर पर. हमारी चेतना का धन के आकर्षण से बचाना भी उसी तरह चेतना की शक्ति पर निर्भर करता है जैसे शरीर का उसकी रोग  प्रतिरोधक क्षमता का. चेतना की यह शक्ति बचपन में सीखे संस्कारों या विकारों में निर्भर करती है. इसलिए भ्रष्टाचार को दूर करनें में माता पिता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. यह विचार व्यक्त किए प्रख्यात लेखक, विचारक एवं प्रखर वक्ता डॉ. विजय अग्रवाल ने.

गुरुवार को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में सतर्कता जागरूकता सप्ताह के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में भ्रष्टाचार एवं समाजिक अवमूल्यन: कारण एवं निदान विषय पर बोल रहे थे. देश के अनेक एवं पाक्षिक अखबारों में नियमित रूप से विशेष कालम लिखने वाले डॉ. विजय अग्रवाल को जीवन दर्शन एवं व्यक्तिगत निर्माण पर अपने महत्वपूर्ण विचारों के कारण चहुओर ख्याति प्राप्त हुई है. युवा वर्ग में विशेष रूप से लोकप्रिय डॉ. अग्रवाल के व्यख्यान के प्रारंभ में ऐतिहासिक एवं साहित्यिक संदर्भो से उदाहरण देते हुए बताया कि हर दर्शन में धन महत्वपूर्ण रहा है. धन का आकर्षण बुरी बात नही है इस आकर्षण में फंसकर व्यवहार करना, उसमें फंस जाना बुरी बात है. भ्रष्टाचार है. भारतीय दर्शन त्याग का दर्शन है और यह त्याग कर्महीनता नहीं. लेकिन आज हमने अपने त्याग की जगह संग्रहण को जीवन मूल्य बना लिया है. भ्रष्टाचार की जड़ है सामंतवादी संस्कृति. जिसके दो चरित्र है पहला है- कर्महीनता तथा दूसरा नियमों का उल्लघन करना. जो व्यक्ति जितना ज्यादा शक्तिशाली है वह उतना ही कर्महीन और नियमों का उल्लघन करनें में अपनी शान समझता है. लेकिन ऐसे प्रत्येक कर्महीन व्यक्ति के समक्ष जीवन संध्या में एक ही यक्ष प्रश्न होगा कि हमने अपनी संतति को क्या संस्कार दिए? हम सभी इस बात को जानते है लेकिन हम भ्रम में जीना चाहते है और यही भ्रष्टाचार का कारण है.

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