विजयादशमी का त्योहार राष्ट्रीय स्तर का पर्व है. इस अवसर पर दिल्ली के रामलीला मैदान में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री मुख्य समारोह में भाग लेते हैं. वहीं राज्यों में राज्यपाल व मुख्यमंत्री इसके समारोहों में शामिल होते हैं. यह देश के हर शहर, कस्बे व गांव में सामाजिक उत्सव की तरह मनाया जाता है. हिमाचल में कुल्लू का दशहरा, छत्तीसगढ़ में बस्तर का दशहरा और कर्नाटक में मैसूर का दशहरा की राष्ट्रव्यापी ख्याति है. रियासतों के भारतीय संघ में शामिल होने से पहले हर रजवाड़े में दशहरा राजकीय उत्सव होता और उसमें शाही भव्यता होती थी. रजवाड़ों की समाप्ति के बाद जनसाधारण द्वारा दशहरे को उसी भव्यता के साथ मनाये जाने का क्रम जारी रहा.

हर धार्मिक पर्व की परिधि व्यक्तिगत, सामाजिक व राष्ट्रीय स्तर की होती है. विजयादशमी के पर्व पर हर जगह एक वाक्य सर्वाधिक बोला है कि यह ”बुराई पर अच्छाई की जीत है. रावण द्वारा वनकुटी से सीता हरण से दशहरा का कथानक प्रारंभ होकर लंका में भगवान राम लंकाधिपति रावण के वध पर खत्म होता है. युगों-युगों (त्रेता युग) से चले आ रहे इस पर्व पर बुराई के प्रतीक के रूप में लंकेश रावण, उनका भाई कुंभकर्ण व उनके पुत्र मेघनाद के पुतले रस्मी तौर पर जलाये जाते हैं. आज यही पुतला जलाना भारत में राजनैतिक आंदोलन के रूप में प्रचलन में आ गया है जब किसी नेता या पार्टी के विरोधी उसका पुतला जलाते हैं.

यदि धार्मिक पर्व व्यक्तिगत, सामाजिक, राजनैतिक व राष्ट्रीय जीवन के आचरण व व्यवहार में परिलक्षित न हो तो वे केवल अर्थहीन और निरर्थक कर्मकांड हैं. इस पर्व का सिलसिला सीता अपहरण से प्रारंभ हुआ. इसका प्रभाव तो यह होना चाहिए भारत वर्ष में किसी भी महिला का अपहरण, दुराचार व उसको बेचना राष्ट्र का सबसे जघन्य अपराध माना जाना चाहिए. महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध अपराध करने वालों को जीवित पुतलों की तरह जला देना चाहिए या उन्हें मृत्युदंड दिया जाए. ऐसे लोगों का सतत वध होते रहना चाहिए, तभी दशहरे पर पुतला दहन व रावणवध लीला करने की सार्थकता है अन्यथा यह भी एक तमाशे की तरह धार्मिक आयोजन है जो साल में एक बार आता है और चला जाता है.

समाज में लगभग हर रोज औरतों का अपहरण और उनसे दुराचार होता है. ऐसा दशहरे के दिन भी कहीं न कहीं होता ही होगा. रावण का कभी त्रेतायुग में वध भी हो गया. लेकिन उसके अनुयायी अभी भी औरतों का अपहरण करते जा रहे हैं. समाज में उनके प्रति आक्रोश कहीं दिखाई नहीं देता. यह मान लिया जाता है कि समाज में ऐसे कई तरह के अपराध चला करते हैं. महिलाओं से दुराचार करने वाले ऐसे कई रावण समाज में मौजूद हैं. भोपाल में बानगंगा निवासी ने उस व्यक्ति को अदालत में जाकर गोली से उड़ा दिया जिसने उसकी पत्नी से बलात्कार किया. उसने उसका वध करके सही मायने में दशहरा मनाया- वही राम का अनुयायी है.

मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने आज इसी पावन दिन से ‘बेटी बचाओ अभियान’ शुरु किया है, इसके लिये वे बधाई के पात्र है. साथ ही दशहरा को मध्यप्रदेश में ‘महिला सम्मान’ दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए. इस दिन उन लोगों को दशहरा मैदान में ले जाकर निर्ममता से पीटा व प्रताडि़त किया जाए, जिन्होंने महिला के सम्मान का उल्लंघन किया है. मध्यप्रदेश में मंदसौर व नीमच की बांछिया जाति के अलावा राज्य भर ऐसे गिरोह भी सक्रिय हैं जो महिला व बालिकाओं का अपहरण व बेचने का ही धंधा करते हैं. इनका भी वध किया जाना चाहिए. केवल रावण का पुतला जलाने से किस उद्देश्य की पूर्ति होती है.

बुराई पर अच्छाई की विजय के लिए भ्रष्टïचार व महंगाई व अपराधों पर भी विजय पाने का संकल्प होना चाहिए. इस वाक्य को समाज की हर बुराई पर लागू करना चाहिये, तभी समाज में बुराई कम अच्छाई ज्यादा नजर आयेगी. अभी तो यह हालत होती जा रही है कि अच्छाई पर बुराई की जीत हो रही है. कुछ पुरातन पंथी शब्द ‘आधुनिकता’ से काफी बिचकते हैं- वे इसे प्राचीन संस्कृति व सभ्यता पर प्रहार मानते हैं. इसलिये आधुनिक शब्द को ‘सामयिक’ कहना चाहिये. समय परिवर्तनशील है और सतत बदलता रहता है. भारत में भी इस समय ‘त्रेतायुग’ की संस्कृति नहीं है. दशहरा पर्व को अब सामायिक रूप देना चाहिये. इस दिन समाज में व्याप्त सभी बुराईयों को इंगित कर उनको खत्म करने की कार्यवाही की जानी चाहिये.

यह स्थिति के बिल्कुल अनुरूप होगा कि इस रोज हर जगह के दशहरा मैदान पर पुतलों के साथ उन लोगों को खड़ा किया जाये, जिन पर महिलाओं को प्रताडि़त करने के अपराध सिद्घ हो चुके हैं और उनके लिये ऐसी सजा का प्रावधान होना चाहिये कि जिसे प्रताडऩा कहा जाये. दशहरा के इस स्वरूप से समाज में महिलाओं के प्रति होने वाले अनाचारी अपराधों में भारी कमी आ जायेगी. दशहरों के जुलूस में ऐसे अपराधियों का भी जुलूस निकालकर उन्हें दशहरा मैदान तक ले जाया जाये. एक अपहरण पर इतना बड़ा युद्घ हो गया कि वह आज भारत की संस्कृति की गाथा बना हुआ है. उस संस्कृति को आज इस युग में सामायिक रूप देकर लोगों को महिलाओं के प्रति सम्मानजनक आचार विचार की परंपरा को जीवित करना ही संस्कृति के प्रति हमारा कर्तव्य होगा.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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