मानवाधिकार संस्थाओं के पैरिस सिद्धान्त क्या है?भारत के न्यायप्रिय लोगों के लिये यह जानना जरूरी हो गया है जबसे संयुक्त राष्ट्रसंघ के मानवाधिकार उच्चायुक्त द्वारा अपने पांच पेजी पत्र में इस बात को स्पष्टï किया गया है कि 1993 के कानून द्वारा गठित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग कई स्तरों पर पैरिस सिद्धान्तों का उल्लंघन करता दिखता है.

मालूम हो कि पिछले दिनों राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा यह सूचित किया गया कि संयुक्त राष्ट्रसंघ की प्रणाली में ‘ए’ दर्जा बरकरार रखने में उसे कामयाबी मिली है- जिसके चलते वह दुनिया की विभिन्न राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की अंतर्राष्ट्रीय समन्वय समिति में न केवल वोट का अधिकारी होगा बल्कि प्रशासकीय जिम्मेदारी भी सम्भाल सकता है. गौरतलब है कि प्रस्तुत खबर के दूसरे हिस्से की चर्चा करना भी मुनासिब नहीं समझा गया कि उसकी कार्यप्रणाली एवं ढांचे में नजर आयी खामियों के मद्देनजर संयुक्त राष्ट्रसंघ के मानवाधिकार उच्चायुक्त द्वारा आयोग पर कई सारी शर्तें भी लादी गई हैं. एक तरह से देखें तो इन शर्तों के जरिए नागरिक समाज के सदस्यों द्वारा आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर जो सवाल उठाये जाते रहे हैं, उन सरोकारों को ही जुबां दी गई हैं.

इसके पहले कि हम इन आपत्तियों की बात करें, मानवाधिकार संस्थाओं के लिए बने पैरिस सिद्धान्तों की पृष्ठïभूमि बयान करना समीचीन होगा. वर्ष 1991 में पैरिस में आयोजित मानवाधिकार के लिए सक्रिय राष्ट्रीय संस्थाओं के पहले अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में इन सिद्धान्तों को परिभाषित किया गया था, जिनको बाद में संयुक्त राष्ट्रसंघ के मानवाधिकार आयोग ने (1992) में अपनाया तथा संयुक्त राष्ट्रसंघ की आम सभा द्वारा भी इस पर मुहर लगा दी गई (1993). राष्ट्रय मानवाधिकार संस्थाओं की भूमिका, संरचना, कार्य को लेकर कई जिम्मेदारियों को पैरिस सिद्धान्तों में प्रस्तुत किया गया है, जिसके अंतर्गत उनके लिए यह लाजिमी माना गया है कि वह मानवाधिकार उल्लंघन की हर स्थिति की देखरेख कर सकेंगे, सरकार तथा संसद को विशिष्ट उल्लंघनों को लेकर सलाह दे सकेंगे, क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के सम्पर्क में रहेंगे, तथा कुछ संस्थाओं की अद्र्धन्यायिक क्षमता होगी.

स्थूल रूप में देखें तो संयुक्त राष्टï्रसंघ मानवाधिकार उच्चायुक्त द्वारा भेजा गया पत्र पांच बिन्दुओं पर आयोग की आलोचना करता है या उससे सफाई की उम्मीद करता है.
पहला सवाल आयोग की संरचना में विविधता के अभाव से जुड़ा है. आयोग की संरचना में न्यायपालिका के वर्चस्व को लेकर पत्र में सवाल उठाए गए हैं जिसके चलते उसके काम करने की प्रभावोत्पादकता पर होने वाले असर को रेखांकित किया गया है. मालूम हो कि आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का पूर्व मुख्य न्यायाधीश ही हो सकता है तथा अधिकतर अन्य सदस्य न्यायपालिका से संबंधित होने से उसकी विविधता पर असर पड़ता है. न्यायपालिका के वर्चस्व को लेकर आयोग की तरफ से पेश स्पष्टïीकरण कि आयोग का काम अद्र्धन्यायिक है को भी पत्र में खारिज किया गया है कि आयोग के संविधान में उल्लेखित दस कामों में से वह एक काम है.

दूसरा अहम सवाल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दो अहम पदों- सेक्रेटरी जनरल और डायरेक्टर जनरल आफ इन्वेस्टिगेशन्स से जुड़ा है. आयोग के संविधान के हिसाब से इन दो पदों पर नियुक्त व्यक्ति सरकार की तरफ से भेजे जाएंगे. पत्र के मुताबिक इस प्रावधान के चलते आयोग की स्वतंत्रता पर असर पड़ता है. यह स्पष्टï किया गया है कि इस प्रावधान को संशोधित करने की और इन दोनों पदों पर मेरिट अर्थात् गुणवत्ता पर आधारित खुले चयन की  हिमायत की गई है. आयोग की कार्यप्रणाली को तीसरी आपत्ति मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ सीमित अन्तक्र्रिया से जुड़ा है. एक अहम बात यह नोट की गई है कि आयोग द्वारा गठित विशेषज्ञ समूह नागरिक समाज के साथ अन्तक्र्रिया और सहयोग नहीं कर रहे हैं.

सुभाष गाताड़े :
संयुक्त राष्ट्र रसंघ के मानवाधिकार उच्चायुक्त द्वारा आयोग पर कई सारी शर्तें भी लादी गई हैं. एक तरह से देखें तो इन शर्तों के जरिए नागरिक समाज के सदस्यों द्वारा आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर जो सवाल उठाये जाते रहे हैं, उन सरोकारों को ही जुबां दी गई हैं.

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