जल समस्या या संकट का निदान यह नहीं कि बरसात आ गई. कभी-कभी आने के बाद भी बीच में लंबा ‘गेप’ हो जाता है तो हालत बहुत खराब हो जाती है. पानी की समस्या और खेती का बिगडऩा सब खत्म कर देता है. बरसात आने का अर्थ अब यह होना चाहिए जितना भी बरस रहा है उसे जमीन पर इकट्ठा कर लें और छतों का पानी भी वॉटर हार्वेस्टिंग में ले लिया जाए. हमें इस खतरे से अब सचेत हो जाना चाहिए. पृथ्वी की पहली परत भूजल के अभाव में सूख चुकी है.

हर साल भूजल 14 फिट नीचे जा रहा है. देश ने अति उत्साह में सभी जगह ट्यूबवेलों का जाल बिछा लिया है. दो ट्यूबवेल में जो दूरी रहनी चाहिए वह भी नहीं रखी गई. परिणाम यह होता है कि भूजल पर दबाव पडऩे से ट्यूबवेल ही ”ड्राई लेबिलÓÓ हो जाता है. निरंतर बढ़ते जा रहे निर्माण कार्यों से खुली कच्ची जमीन दिनों दिन कम होती जा रही है और पानी जमीन में बैठ नहीं पाता. अब यह जरूरी हो गया है कि शहरों में भी जगह-जगह खुली जमीन छोड़ी जाएं और उन्हें बलराम तालाब या देवास के रेवा सागर का रूप दिया जाए. वर्षा के बाद प्रकृति का असली जल संग्रहण भूजल ही है. यह जमीन के नीचे प्रकृति का तालाब या नदी है यदि यह भरा हुआ है तो समाज यदाकदा आने वाले ”सूखा मौसम” का भी बड़ी आसानी से मुकाबला कर लेगा. यदि भूजल नहीं है तो सामान्य मौसम में भी पानी का अभाव वर्षा के खत्म होते ही सामने आ जाता है. यह विचार भी चल रहा है कि अब व्यक्तिगत ट्यूबवेलों को बंद करा दिया जाए और मोहल्लेवार योजनाबद्ध तरीके से सामूहिक ट्यूबवेल बना दिए जाएं. विचार तभी सार्थक है जब उन्हें क्रियान्वित किया जाए.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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