पृथ्वी के पड़ोसी मंगल ग्रह पर हाल में पहुंचा क्यूरिऑसिटी रोवर लाल ग्रह की सतह का एक बार फिर से मुआयना करेगा। इससे पहले भी कई मिशन मंगल पर भेजे जा चुके हैं और कुछ वर्ष पूर्व वहां जीवन की संभावना पर खासा जोर दिया गया था। इस बार भी कुछ ऐसी ही उम्मीद जाहिर की गई है, जो पिछली बार की तुलना में कुछ कदम आगे है। मंगल ग्रह से जुड़े तमाम हालिया कौतुहल पर देवेंद्र मेवाड़ी की एक नजर

रो वर में 10 वैज्ञानिक उपकरण हैं, जिनमें से एक लेजर फायरिंग उपकरण भी है, जो चट्टानों की संरचना की जांच कर रहा है। रोवर की रोबोटिक बांह जमीन में ड्रिल करके मिट्टी के नमूने लेती है। इस चलती-फिरती गाड़ी में 17 कैमरे लगे हैं, जो सतह के चप्पे-चप्पे पर नजर रख रहे हैं। अन्य उपकरण मंगल के तापमान, हवाओं की गति, वायुमंडलीय दबाव और अल्ट्रावॉयलेट किरणों का पता लगा रहे हैं।

नासा के क्यूरिऑसिटी रोवर ने मंगल ग्रह पर जीवन की तलाश शुरू कर दी है। क्यूरिऑसिटी उपकरणों से सुसज्जित एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला है, जो जमीन के र्जे-र्जे की बारीक जांच करके यह पता लगा रही है कि क्या मंगल ग्रह में किसी भी प्रकार का कोई जीवन है या अतीत में कभी था। उसकी मुकम्मल वैज्ञानिक पड़ताल के बाद ही इस बात का पता लग सकेगा कि वहां जीवन का कोई सुराग मिला या नहीं।

लेकिन क्यूरिऑसिटी ने अब तक जो तस्वीरें भेजी हैं, कई लोगों ने उन्हें देख कर अपना मिथ्या अनुमान लगाना शुरू कर दिया है कि वहां कोई है। इस भ्रम में उन्हें मंगल के क्षितिज पर यूएफओ यानी उडऩतश्तरियां दिखाई दे रही हैं, जबकि अंतरिक्ष वैज्ञानिक साफ कह रहे हैं कि क्यूरिऑसिटी को मंगल की सतह पर अवतरण के लिए छोडऩे के बाद शेष यान दूर जाकर सतह से टकराया और वे उससे उठे धूल के गुबार हैं।

कुछ लोग यह कयास भी लगा रहे हैं कि वहां की जमीन पर यहां-वहां बिखरी चट्टानों के टुकड़ों में से कोई टुकड़ा मंगलवासी जीव हो सकता है। चट्टान का लंबा पतला टुकड़ा उन्हें किसी मंगलवासी की अंगुली का टुकड़ा लग रहा है, जिस पर नाखून भी है! यही नहीं, अभी कुछ वर्ष पहले मंगल पर एक चट्टान की छवि को वहां बैठी हुई महिला तक घोषित कर दिया गया था।

यानी ये लोग मंगल पर जीवन की कल्पना स्वयं अपने ही रूप में कर रहे हैं, बिना यह सोचे-समङो कि वहां की परिस्थितियां क्या हैं और क्या मानव जैसा कोई प्राणी उन परिस्थितियों में वहां जीवित भी रह सकता है या नहीं? ये अनुमान अतीत में लगाए गए उन अनुमानों से भिन्न नहीं हैं, जिनमें मंगल पर नहरों के सुनियोजित जाल और वनस्पतियों की कल्पना की गई थी। नहरों के इस भ्रम को 1965 और उसके बाद मंगल को नजर-भर देखने वाले मेरीनर अंतरिक्षयानों और उसके बाद वहां भेजे गए वाइकिंग, मार्स, फोबोस, मार्स पाथ फाइंडर, मार्स ग्लोबल सर्वेयर, मार्स ओडिसी, मार्स एक्सप्रेस, मार्स स्प्रिट, अपॉर्च्युनिटी, मार्स रीकोनेसेंस ऑर्बिटर और फीनिक्स जैसे अंतरिक्षयानों ने ध्वस्त कर दिया।

मंगल ग्रह पर जीवन की कल्पना करते समय इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि वहां ठोस धरती जरूर है, लेकिन वह बेहद रूखी-सूखी है और पूरे ग्रह पर धूल भरी तेज आंधियां चलती रहती हैं। मंगल के वायुमंडल में 95. 32 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड, 2. 7 प्रतिशत आणविक नाइट्रोजन, 1.6 प्रतिशत आर्गन और मात्र 0.13 प्रतिशत आणविक ऑक्सीजन का अंश मौजूद है। ऐसी हवा में हमारी पृथ्वी के कार्बन की शरीर-रचना वाले प्राणी जीवित नहीं रह सकते। इसलिए वहां मानव जाति के समान किसी सभ्यता की कल्पना करना महज कपोल-कल्पना ही साबित होगी।

हां, हो सकता है, वहां कार्बन की बजाय किसी अन्य तत्व पर आधारित जीवन का विकास हुआ हो या यह भी हो सकता है कि मंगल के बर्फीले ध्रुवों या उसकी धरती में छिपे जलाशयों और नम मिट्टी में सूक्ष्मजीवों का विकास हुआ हो! उन सूक्ष्मजीवों का अदृश्य संसार केवल सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से ही देखा जा सकता है अथवा उनकी उपस्थिति का पता वैज्ञानिक विश्लेषणों से ही लगाया जा सकता है। क्यूरिऑसिटी रोवर वहां इसी तरह जीवन की तलाश कर रहा है। आज वहां जीवन है या नहीं, यह तो जांच से ही पता लगेगा, लेकिन इस बात के पुख्ता सुबूत जरूर मिल चुके हैं कि मंगल पर कभी भरपूर पानी था। वहां भी कभी पानी से लबालब भरे जलाशय रहे होंगे, वहां भी कभी नदियां बही होंगी। तो क्या तब वहां जीवन भी पनपा होगा? क्यूरिऑसिटी प्रयोगशाला इस बात का पता लगाएगी।

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