भोपाल, 13 मई. मीनाक्षी नटराजन के इतिहास ग्रंथ 1857 भारतीय परिप्रेक्ष्य में भारत के पहले व्यापक स्वतंत्रता संग्राम को समग्रता और प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया गया है. यह उदगार साहित्यकार और वरिष्ठï राजनेता बालकवि बैरागी ने पुस्तक पर आयोजित विमर्श में व्यक्त किए. कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ हिन्दी सेवी कैलाशचंद्र पंत ने की.

माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान में आयोजित विमर्श के मुख्य अतिथि बालकवि बैरागी ने कहा. उन्होने पुस्तक में 365 वर्षों के इतिहास का लेखाजोखा बहुत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है. जो इस कृति को पठनीय और संग्रहणीय बनाता है. उन्होन इस बात पर जोर दिया कि नई पीढ़ी को इस ग्रंथ का अध्ययन जरुर करना चाहिये. 1857- भारतीय परिप्रेक्ष्य की  लेखिका मीनाक्षी नटराजन ने प्रतिपादित किया कि 1857 सैन्य विद्रोह नहीं था वरन जनक्रांति थी. पुस्तक पर विशेष टिप्पणी करते हुये इतिहासकार शंभुदयाल गुरु ने कहा कि यह बड़े संतोष की बात है. कि मीनाक्षी नटराजन जैसी युवा राजनेता ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पर केन्द्रित इस महत्वपूर्ण कृति की रचना की है. उनका यह रचनात्मक अवदान आशा जगाता है. लेखिका ने इस पुस्तक के बहाने मप्र में 1857 के आसपास हुये महत्वपूर्ण विद्रोहों पर प्रामाणिक सामग्री जुटाई है. 1957 की क्रांति में आम आदमी की सक्रिय भागीदारी थी. जिसमें हिन्दू और मुस्लिम दोनो ही शामिल थे.

इतिहास विद डॉ. सुरेश मिश्र ने कहा कि 1957 की क्रांति के पूर्व देश में छोटे बड़े कुल 98 विद्रोह हुये थे. जिनमें आदिवासियों द्वारा किये गये विद्रोह विशेष महत्वपूर्ण थे. जिनकी भारी उपेक्षा विदेशी इतिहासकारों द्वारा की गई. वस्तुत: आदिवासियों द्वारा किये गये इन विद्रोहों ने 1857 की क्रांति की पृष्ठïभूमि तैयार की थी. वरिष्ठï साहित्यकार कैलाशचंद्र पंत ने अध्यक्षीय उद्ïबोधन में कहा कि प्रस्तुत कृति 1857- भारतीय परिप्रेक्ष्य में लेखिका ने भारतीय दृष्किोण को समक्ष रखकर इतिहास लेखन का स्तुत्य प्रयास किया जो कृति की विशेषता है. मैने स्वयं इस पुस्तक को पढ़कर अनुभवन किया है कि उस युवा को यह पुस्तक अवश्य पढऩा चाहिये जिसका तनिक भी अनुराग देश और समाज के प्रति है.

समारोह के प्रारंभ में सप्रे संग्रहालय के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर ने प्रस्तावना उद्ïबोधन में कहा कि मीनाक्षी नटराजन के शोधपरक अध्ययन का सुफल 1857 भारतीय परिप्रेक्ष्य कृति है. उन्होने मंचासीन अतिथियों जिनमें डॉ. पियूष त्रिवेदी कुलपति, राजीव गंाधी प्रौद्योगिकी विवि भोपाल भी शामिल थे, का सम्मान किया. कार्यक्रम का संचालन डॉ. आर रत्नेश ने किया. अंत में प्रकाशन सामयिक प्रकाशन के महेश भारद्वाज ने धन्यवाद ज्ञापन किया.

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