वोडाफोन टैक्स केस में आयकर विभाग को झटका

नई दिल्ली,20 जनवरी.  उच्चतम न्यायालय ने टैक्स विवाद मामले में दूर संचार कंपनी वोडाफोन को आज बड़ी राहत प्रदान करते हुए टैक्स के 11 हजार करोड रुपये नहीं जमा कराने का आदेश दिया। मुख्य न्यायाधीश एस एच कपाडिया, न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन एवं न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की खंडपीठ ने वोडाफोन इंटरनेशनल होल्डिंग की विशेष अनुमति याचिका मंजूर करते हुए केन्द्र सरकार को बड़ा झटका दिया।

न्यायालय ने वोडाफोन की ओर से जमा कराए गए 25 सौ करोड रुपये चार प्रतिशत ब्याज के साथ दो महीने के भीतर वापस करने का केन्द्र सरकार को निर्देश दिया। वोडफोन की दलील थी कि हांगकांग की दूरसंचार कंपनी हचिंसन के साथ उसका सौदा विदेश में हुआ है इसलिए वह भारत सरकार को टैक्स के रूप में 11 हजार करोड़ रुपये देने के लिए बाध्य नहीं है जिसे न्यायालय ने जायज ठहराया। सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडिय़ा की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने आज व्यवस्था दी कि विदेश में पंजीकृत कंपनियों के बीच विदेश में हुए सौदे पर कर लगाना भारत के आयकर विभाग के क्षेत्राधिकार में नहीं हैं। मुख्य न्यायाधीश कपाडिय़ा और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार के निष्कर्ष से सहमत जताते हुए न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन ने एक अलग आदेश में कहा कि भारत से बाहर गठित कंपनियों (वोडाफोन और हचिसन) के भारत से बाहर हुए सौदे का भारत के कर विभाग से कोई संबंध नहीं है। न्यायमूर्ति राधाकृष्णन ने कहा कि इसम मामले में  कि आयकर अधिनियम की धारा 163 के उपबंध 1(सी) के तहत वोडाफोन का कोई दायित्व नहीं बनता है।

अदालत ने आयकर विभाग से कहा कि न्यायालय के अंतरिम आदेश के अनुरूप वोडाफोन द्वारा जमा किए गए 2,500 करोड़ रुपये को चार फीसदी की ब्याज के साथ दो महीने के भीतर कंपनी को वापस कर दिया जाए। इसके अलावा उच्चतम न्यायालय ने वोडाफोन द्वारा दी गई 8,500 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी को भी चार हफ्तों के भीतर वापस करने का निर्देश दिया है। वोडाफोन ने हालांकि मई 2007 में 11.2 अरब डालर के सौदे में नीदरलैंड और केमैन द्वीप की कंपनियों के जरिए हांगकांग के हचिसन के समूह से हचिसन-एस्सार लिमिटेड में 67 फीसद हिस्सेदारी खरीदी थी। वोडाफोन की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकीलों में एक अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि हम कोर्ट के आदेश से खुश हैं। न्यायालय ने इस मामले की गहनता से छान-बीन की और निष्कर्ष पर पहुंचा। नतीजा जो भी हो यह भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए बड़ी विजय है। वोडाफोन ने सितंबर 2010 में बंबई हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें कहा गया था कि यह सौदा भारतीय आयकर विभाग के क्षेत्राधिकार में आता है। आयकर विभाग ने कहा कि इस सौदे के जरिए भारत में पूंजीगत लाभ कमाया गया इसलिए वोडाफोन को कर का भुगतान करना होगा और एक कारण बताओ नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया कि उसे वोडाफोन इंटरनेशनल होल्डिंग के प्रतिनिधि करदाता क्यों नहीं माना जाए।

वोडाफोन ने इस नोटिस को बंबई उच्च न्यायालय में यह कहते हुए चुनौती दी कि शेयरों का हस्तांतरण भारत से बाहर किया गया है और इस यह सौदा भारत के आयकर विभाग के अंधिकार क्षेत्र में नहीं आता। दिसंबर 2008 में हाईकोर्ट इस अपील को खारिज कर दिया जिसे वोडाफोन ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने भी जनवरी 2009 में वोडाफोन की अपील को खारिज कर दिया और आयकर विभाग को निर्देश दिया कि इस बात का फैसला करने कि यह सौदा उसके क्षेत्राधिकार में आता है या नहीं। उच्चतम न्यायालय ने हालांकि साथ में यह भी व्यवस्था दी थी कि यदि वोडाफोन को इस विषय पर आयकर विभाग के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की छूट होगी। साथ ही कहा कि इस मामले में कानून के प्रश्न हमेशा उठाए जा सकते हैं। वोडाफोन ने 14 सितंबर 2010 को उच्चतम न्यायालय में इस फैसले को चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितंबर 2010 को जारी अंतरिम आदेश में उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ स्टे देने से इनकार कर दिया था। नवंबर 2010 में उच्चतम न्यायालय ने वोडाफोन से कहा कि वह सुनवाई शुरू होने से पहले 2500 करोड़ रुपए जमा करे और 8,500 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी दे। न्यायालय यह भी कहा कि यदि मामला वोडाफोन के पक्ष में जाता है कि सरकार को ब्याज समेत वोडाफोन को यह राशि वापस करने होगी। उच्चतम न्यायालय ने तीन अगस्त 2011 केा इस मामले की सुनवाई शुरू की थी और 19 अक्तूबर 2011 को अपना फैसला सुरक्षित रखा था।

एफआईयू ने लगाया 60 बड़े टैक्स चोरों का पता
नई दिल्ली। टैक्स चोर अब खैर मनाएं। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने फाइनैंशल इंटेलिजेंस यूनिट (एफआईयू) की मदद से बड़ी टैक्स चोरी करने वाले 60 से ज्यादा लोगों का पता लगाया है। ये लोग कई साल से इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की पहुंच से बाहर थे। फाइनैंस मिनिस्ट्री के अफसरों ने बताया कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट अब इनके खिलाफ कार्रवाई की तैयारी कर रहा है। एक अधिकारी ने बताया कि एफआईयू को टैक्स चोरी करने वाले इन लोगों के 350 से ज्यादा बैंक अकाउंट का पता चला है। उन्होंने बताया कि सर्विलांस के दौरान इन अकाउंट्स में एक्टिव ट्रांजैक्शंस का पता चला। इनमें से कुछ ने खुद को दिवालिया घोषित किया हुआ था। हालांकि, वे नई मिल्कियत खरीद रहे हैं। अधिकारी ने बताया, एफआईयू डाटा से सफलता का रिकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है।  वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने एजेंसियों से मिलने वाली जानकारी की जांच के लिए एक सेल बनाया था। टैक्स चोरी करने वाले लोगों को पकडऩा इसका मकसद था। 31 मार्च 2011 को कुल डायरेक्ट टैक्स एरियर 3.3 लाख करोड़ रुपये था। इसमें 1.97 लाख करोड़ पर्सनल इनकम टैक्स और 1.4 लाख करोड़ कॉरपोरेट टैक्स था।

कम्पट्रोलर ऐंड ऑडिटर जनरल (कैग) ने ऑडिट में पाया था कि 30 सितंबर 2010 तक 1.65 लाख करोड़ की वसूली नहीं हो सकी थी। इसमें करीब 90,000 करोड़ रुपए इसलिए नहीं मिल पाए, क्योंकि एसेसी का पता नहीं लगाया जा सका या उनके पास रिकवरी के लिए एसेट नहीं थे। एफआईयू को 271 मामलों की लिस्ट दी गई, जिनसे रिकवरी की जा सकती थी। एफआईयू बैंकों और दूसरे फाइनैंशल इंस्टिट्यूशन से डाटा जुटाती है। प्रिवेंशन ऑफ मनी लाउंडरिंग ऐक्ट के तहत फाइनैंशल इंस्टिट्यूशन और सिक्योरिटीज मार्केट की इंटरमीडियरीज को 10 लाख रुपए से ज्यादा का ट्रांजैक्शन करने वाले लोगों का 10 साल का रिकॉर्ड देना पड़ता है। इसके अलावा उन्हें ‘ संदिग्ध ट्रांजैक्शन ‘ करने वाले लोगों का भी रिकॉर्ड देना पड़ता है। टैक्स चोरी करने वाले इन लोगों का प्रोफाइल तैयार करने के लिए एनुअल इंफामेर्शन रिटर्न (एआईआर) जैसे दूसरे स्त्रोतों से हासिल डाटा को इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के आंकड़ों से मिलाया जा रहा है।

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