यह तो नहीं कहा जा सकता कि मध्यप्रदेश में शराब बंदी (Prohibition) हुई है. लेकिन राज्य सरकार ने शराब में कटौती जरूर की है. हो सकता है कि आगे चलकर यह नशाबंदी का रूप ले ले. मंत्री मंडल ने यह फैसला किया है कि अगले वित्तीय वर्ष 2012-13 में राज्य में कही भी शराब की नई दुकान नहीं खुलेगी. देसी व विदेशी शराब की जितनी दुकानें अभी है वे कायम रहेंगी. इनके आरक्षित मूल्यों में 20 प्रतिशत वृद्धि की गई है. इनकी बेसिक लाइसेंस फीस नगर निकाय क्षेत्रों में वार्षिक मूल्य की 60 प्रतिशत व अन्य जगहों पर 55 प्रतिशत रहेगी.

अफीम से संबंधित डोडा चूरा (पापी स्ट्रा) थोक लाइसेंस में 10 प्रतिशत वृद्धि की गई है. पूरे भारत में शराब एक समस्या बनी हुई है. संविधान के निदेशात्मक सिद्धांत (Directive Principles) में कहा गया है कि राष्ट की नीति शराब बंदी  (Prohibition) की होगी. आजादी के बाद कई राज्यों में जिसमें मध्यप्रदेश का पूर्ववर्ती रूप सी.पी. एंड बरार प्रांत भी था वहां पूर्ण शराब बंदी थी. बंबई प्रेसीडेंसी जिस में महाराष्ट, गुजरात व कर्नाटक का एक भाग था वहां भी शराब बंदी थी. मद्रास प्रेसीडेन्सी (तमिलनाडु) में मुख्यमंत्री अन्ना दुराई की सरकार ने नशा बंदी लागू की थी. हाल ही पिछले कुछ वर्षों में आंध्र में मुख्यमंत्री श्री एन.टी. रामाराव व हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री वंशीलाल ने शराब बंदी लागू की. लेकिन उससे राज्य भर में कच्ची व अवैध शराब की भट्टियों की बाढ़ आ गई. सीमावर्ती राज्य जहां शराबबंदी नहीं थी वहां सीमा के निकट भारी संख्या में शराब की दुकानें खुल गई और उन राज्यों में शराब की तस्करी भी जोरों से होने लगी. नतीजा यह हुआ कि जिन राज्यों ने शराब बंदी कर दी थी उन्होंने उसे खत्म कर पुन: शराब बेचने की इजाजत वैध रूप से दे दी. अनुभव यह बताता है कि देश में एक या कुछ राज्य शराब बंदी नहीं चला सकते, वह असफल रहेगी. लेकिन जब संविधान में यह निर्देश दिया गया है तो केंद्र सरकार को ही पूरे देश में एक साथ नशाबंदी करनी चाहिए. अब तो शराब से भी ज्यादा खतरनाक ड्रग भी नशे में आ गये हैं. ये अभी भी प्रतिबंधित व अपराध है. इन सबको एक साथ पूरी कड़ाई से रोका जाना चाहिए. केवल इनके विरुद्ध सरकारी प्रचार से कुछ होने वाला नहीं है.

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