सियासी चश्मे से रामपाल और हेमंत कटारे कांड

विशेष प्रतिनिधि
भोपाल,

एक मजबूत लोकतंत्र में पक्ष एवं प्रतिपक्ष का समान महत्व माना गया है लेकिन शासन पक्ष की निष्पक्षता में ही लोकतंत्र की सफलता व सार्थकता निहित है. राजनीतिक विषयों तक तो सहमति-असहमति स्वीकार्य है लेकिन शासन व्यवस्था व कानून के परिपालन में जब व्यवस्था ‘सियासी चश्मे’ से कार्य करे तो यह लोकतंत्र के लिए विषम संकेत है.

एक छात्रा द्वारा दुराचरण का आरोप लगाए जाने के बाद अटेर के कांग्रेसी विधायक हेमंत कटारे के विरुद्ध तत्काल प्रकरण दर्ज होने एवं अपनी नवविवाहिता पुत्रवधु की आत्महत्या के मामले में प्रदेश के ताकतवर मंत्री रामपाल सिंह और उनके बेटे गिरिजेश के खिलाफ़ मृतका के परिवार की सतत शिकायत तथा प्रदेशभर में उपजे व्यापक विरोध के बावजूद पंद्रह रोज बाद भी अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई न होने से यही संदेह प्रतिपादित होता है कि मप्र की ‘व्यवस्था’ में गुण-दोष के आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक लाभ-हानि के गणित के आधार पर कार्रवाई की जा रही है.

कैबिनेट मंत्री रामपाल सिंह की बहू की आत्महत्या की घटना के बाद से ही सरकार उन्हें मंत्री पद पर बचाए रखने के प्रयास में लग गई है. यहां तक कि मृतका प्रीति के पति गिरिजेश के खिलाफ भी अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है. केवल खानापूर्ति की प्रक्रियाएं चल रही है और पुलिस यह अभिनय करने की कोशिश कर रही है कि वह कार्रवाई में संलग्न है. किन्तु कोई ठोस परिणाम हाथ में नहीं आना लोकतंत्र में चिंताजनक है!

सरकारी स्तर पर घटना के तीसरे दिन ही रामपाल सिंह को क्लीनचिट देना और सत्ताधारी पार्टी संगठन के प्रदेश के आला पदाधिकारियों द्वारा रामपाल सिंह से घर जाकर मुलाकात करने से जनमानस में यही संकेत गया कि प्रदेश सरकार न सिर्फ उनके प्रति ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ रखती है बल्कि उन्हें कसूरवार भी नहीं मानती.

प्रदेश भर में हो रहे कर्मचारी आंदोलनों की आग को शांत करने ताबड़तोड़ चुनावी घोषणाएं कर रही प्रदेश सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता सब देख रही है और अभी भी मंत्री रामपाल सिंह के खिलाफ़ वैसी ही त्वरित कार्रवाई की उम्मीद लगाए है जैसी कार्रवाई विधायक कटारे के प्रकरण में की गई.

बहू की आत्महत्या के मामले में मंत्री रामपाल सिंह की भूमिका के प्रति इसलिए गहरा संदेह उपजता है क्योंकि वे पहले तो प्रीति को अपनी बहू मानने से ही इंकार करते रहे और बाद में उसे अपनी बहू मान लिया, लेकिन इतने मात्र से तो दिवंगत प्रीति को इन्साफ़ नहीं मिल जाएगा.

उधर, उपचुनाव में भाजपा को शिकस्त देकर पहली बार विधायक बने हेमंत कटारे के खिलाफ़ मामले में कानूनी प्रक्रिया का पालन करने में गजब की जो चुस्ती-फुर्ती राज्य सरकार की मशीनरी ने दिखाई, कुछ वैसी ही उम्मीद रामपाल सिंह के मामले में थी लेकिन सुशासन व निष्पक्षता का दावा करने वाली व्यवस्था ने अपनी आंखों पर अपने-पराए का भेद करने वाला सियासी चश्मा चढ़ा लिया है.

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