अब देश के सामने यह सवाल नहीं रह गया है कि फिल्म पद्मावत सही है या गलत और इसका प्रदर्शन हो या न हो बल्कि अब यह सवाल है कि इस देश में सरकारें हैं या नहीं.

राजस्थान का एक जातीय संगठन करणी सेना देश की सर्वोच्च न्यायालय की खुली अवहेलना कर रहा है.केंद्र व राज्य सरकारों को हिंसा से खुली धमकी दे रहा है कि हम तो फिल्म ‘पद्मावत’ चलने नहीं देंगे और अगर सरकारों में दम है तो वह इस फिल्म का प्रदर्शन करके बताये.

देश की शासन व्यवस्था के अनुसार इस देश में कौन सी फिल्म किस रूप में दिखाये यह कानूनी संस्था फिल्म सेन्सर बोर्ड (बोर्ड आफ फिल्म सर्टिफिकेशन) करता है.

सुप्रीम कोर्ट ने 23 जनवरी को मध्यप्रदेश व राजस्थान की सरकारों की इस फिल्म के विरुद्ध याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि सरकारें ही यह कह रही हैं कि उन्हें हिंसा व धमकियां मिल रही हैं कि हम ऐसी याचिकाओं पर कैसे विचार कर सकते हैं? सेंसर बोर्ड अपना काम कर चुका है कि उसने फिल्म को पारित कर दिया अब यह सरकारों का काम और दायित्व है कि वह इस फिल्म का प्रदर्शन कराये. हिंसा और धमकियों का काम अराजक तत्व कर रहे.

उनके विरुद्ध सरकारों को कार्यवाही करना ही होगी. दूसरी और करणी सेना ने भी मध्यप्रदेश व राजस्थान सरकारों को उनकी हैसियत बताना शुरू कर दिया. उसने कहा है कि इन राज्य सरकारों ने इसे बेन क्यों किया. यह उनका अधिकार क्षेत्र ही नहीं है. वे क्यों सुप्रीम कोर्ट आईं और यह तमाशा किया. सेंसर बोर्ड केंद्र सरकार की संस्था है और इस पर केंद्र सरकार को इन फैसलों के बाद अध्यादेश निकालकर बेन करना चाहिए.

यदि यह फिल्म इस देश में नहीं चली तो निश्चित ही इस देश में सरकारें सरकार ही नहीं रहेंगी और कोई भी संगठन हिंसक होकर केन्द्र व राज्य सरकारों, सुप्रीम कोर्ट, संसद की सत्ता को नकार देगा. इनके निर्णयों का कभी कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा.

इससे पहले भी यूपीए के शासन के लिये जाटों के आरक्षण आन्दोलन से ऐसा हो चुका है. इस प्रश्न पर हिंसक होकर जाटों ने मुम्बई सेन्ट्रल-दिल्ली रेल मार्ग पर राजस्थान के कोटा डिवीजन में रेल पटरियों पर तम्बू गाडक़र धरने पर बैठ गये. पूरे एक महीने तक इस पूरे सेक्शन पर रेल यातायात ठप्प रहा.

देश का रेल यातायात जो इन्टरलिंक्ड रहता है- वह ही अस्त-व्यस्त रहा. ऐसा हो गया था कि वहां कोई भी केन्द्र व राज्य सरकार नहीं है. जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इस बारे में कार्यवाही करने को कहा तभी जाकर स्थिति बहाल हुई. बाद में जाटों ने हरियाणा में भी रेल को रोका और यहां भी सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा. यहां जाटों ने पूरा रोहतक शहर जला डाला.

अक्सर सरकारें यह कहती रहती हैं कि अदालतों को सरकार के नीतिगत मामलों में दखल नहीं देना चाहिए और अदालतें यह कहती हैं जो काम सरकारों को खुद करना चाहिए वे करती नहीं हैं और अदालतों को करना पड़ता है. वे इसे करें.

इस समय भी सेंसर बोर्ड के निर्णय को सरकारों को ही लागू करना होगा अन्यथा वे सरकारें ही नहीं हैं और जिस देश में सरकार नहीं है वहां केवल ‘अराजकता’ ही रहेगी और देश का सर्वनाश हो जाएगा. जिन्हें असफल राष्ट्र (फेल्ड स्टेट) कहा जाता है.

यदि कोई भी राज्य सरकारें इस फिल्म को प्रदर्शित नहीं करा सकतीं तो संविधान के प्रावधानों के तहत यह माना जाना चाहिए कि उन राज्यों में संविधान के अनुरूप शासन नहीं चलाया जा सकता इसलिए उन्हें सरकारों को बर्खास्त कर वहां राष्ट्रपति शासन लगाकर केंद्र सरकार इस फिल्म को प्रदर्शित कराये अन्यथा मोदी सरकार को ही अपनी असफलता स्वीकार कर त्यागपत्र देकर देश में नया लोकसभा चुनाव
कराया जाए.

देश हिंसा और अराजकता की ओर बढ़ चुका है इसके भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगेंगे कि क्या भारतीय जनता पार्टी की केंद्र व राज्य सरकारों ने हिंसा व धमकियों के सामने घुटने टेक कर आत्मसमर्पण कर दिया और देश में हिंसा और अराजकता आ चुकी है.

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