अयोध्या-रामलला मंदिर-बाबरी मसजिद के मामले में सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा फैसला प्रकरण के फैसले से पहले ही आ गया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा ने यह घोषित कर कहा यह मामला पूरी तरह भूमि विवाद का है.

इसमें केवल पक्षकारों को सुना जायेगा. भावनात्मक दलीलें नहीं सुनी जायेंगी. दस्तावेजों को अंग्रेजी अनुवाद करने के लिये सुप्रीम कोर्ट ने दो सप्ताह का समय देकर मामले की सुनवाई के लिए 14 मार्च की तारीख दे दी और इसी दिन से नियमित सुनवाई शुरू होगी.

इससे यह स्पष्ट ही हो गया कि मंदिर-मसजिद के विवाद में यह तय होगा कि वह जमीन किसकी है. इसका निर्धारण संभवत: इसी बात से हो सकता है कि अंग्रेजों ने अपने शासन काल में आधुनिक तौर तरीके से देश में लेंड सर्वे एंड सेटिलमेंट (इस्तमरारी बंदोबस्त) किया था.

उसमें जमीन की मालाकियत क्या दर्ज है. यह मामला इतिहास की दृष्टिï से दो कालों प्राचीन (एन्शीयेन्ट) इतिहास और मध्यमकालीन (मेडीवल) इतिहास से भी देखा जा सकता है. रामलला का मंदिर प्राचीन इतिहास काल का है.

वहां बाबरी मसजिद का बनना मध्यकालीन इतिहास है, जिसमें मुगल काल प्रमुख था. इनके दस्तावेज, शिलालेख ताम्रपत्र के रूप में हो सकते है जिनका समय काल निर्धारण भारत के पुरातत्व विभाग ने ही किया होगा और ये दस्तावेज उसकी संपत्ति के रूप में हो सकते है.

श्री दीपक मिश्रा सहित तीन जजों की बेन्च ने मुकदमे का जो रूप निर्धारण किया है वह इस लंबे चले आ रहे विवाद को सही मार्ग पर ले गया और लगातार सुनवाई में अब इसका निराकरण हमेशा के लिये हो जायेगा. यह भी निश्चित ही समझा जा सकता है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को विवाद में जमीन को तीन बराबर हिस्सों में रामलला, निमौही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में बांटने का आदेश दिया था. सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मामला इसी फैसले के विरुद्ध अपील के रूप मेंं चल रहा है.

कोर्ट को एडीशनल सोलीसीटर जनरल श्री तुषार मेहता ने बताया कि दोनों पक्षों में दस्तावेजों का आदान-प्रदान लगभग पूरा हो चुका है. कुछ पुस्तकों का अनुवाद नहीं हो पाया है. कोर्ट ने कहा है कि अब जब भी मामले की सुनवाई होगी तो फिर लगातार चलेगी. यह तारीख 14 मार्च है.

कोर्ट मेें सुनवाई के तरीके भी तय दिये हैं कि पहले सिर्फ अपील करने वाले पक्षकारों को सुना जायेगा. तमाम हस्तक्षेप याचिकाओं पर बाद में समय आने पर विचार किया जायेगा.

इससे पहले दिसम्बर को हुई सुनवाई में सुन्नी वक्फ बोर्ड और सभी पक्षों की इस अपील को खारिज कर दिया था कि इस मामले को लोकसभा के अगले आम चुनाव के बाद ही सुना जाए. सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह साफ कर चुका है कि पहले वह यह तय करेगा कि भूमि पर किसका अधिकार है.

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 सितम्बर 2010 के फैसले पर मई 2011 में अगले आदेश तक रोक लगा दी थी और अब यह मामला अंतिम फैसले की स्टेज पर आ गया है.

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